हममे से कई लोग ऐसे होंगे जो IAS ऑफिसर बनकर देश की सेवा करने का सपना देखते है। लेकिन तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद आईएएस का एग्जाम निकाल पाना हर किसी के बस की बात नही है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी है जो गरीबी और तमाम तरह की परीस्थितियों का सामना करते हुए आज आईएएस ऑफिसर बने है। जी हाँ आज हम आपको ऐसे ही एक शख्स से मिलवाने जा रहे है जिसकी कहानी आपको इंस्पायर कर देगी। दरअसल ये कहानी किसी एक शख्स की सफलता की कहानी नही है बल्कि ये कहानी है दृढ़ संकल्प की, गरीबी और लाचारी की बेड़ियां तोड़कर सफलता हासिल करने की, ये कहानी है एक रिक्शा चालक के बेटे की आईएएस ऑफिसर बनने की। तो आइये जानते है रिक्शा चालक के बेटे गोविंद जायसवाल की आईएएस ऑफिसर बनने की कहानी।

2006 में अपने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 45वीं रैंक हासिल करने वाले गोविंद जायसवाल ने अपनी पढ़ाई हिंदी माध्यम से की है। हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वालों में गोविंद ऑल इंडिया टॉपर रहे थे। गोविंदा जायसवाल के शुरूआत जीवन के बारे में बात करें तो उनका जन्म 8 अगस्त 1983 को बनारस में हुआ था। गोविंद के पिता अनपढ़ है और बनारस में रिक्शा चलाने का काम करते थे। गोविंद ने शुरूआती पढ़ाई बनारस के उस्मानपुर क्षेत्र के एक स्कूल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने जौनपुर के एक कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई की। गोविंद की माँ का बचपन में ही देहांत हो गया था। गरीबी ऐसी थी की पांच सदस्यों का परिवार एक ही कमरे में रहता था। गोविंद की तीन बहने थी। पिता नारायण जायसवाल ने चारों बच्चों की परवरिश के लिए दिन-रात मेहनत की। कड़ाके की सर्दी हो, तेज गर्मी हो या फिर बारिश उनके पिता ने हर दिन रिक्शा चलाया और बच्चों का पेट भरा। घर की हालत देखकर गोविंद का आईएएस बनने का संकल्प और भी मजबूत हो गया कि अब किसी भी किमत पर आईएएस बनना ही है।
पढ़ाई में शुरू से ही तेज रहे गोविंद को पिता ने आईएएस बनाने के लिए अपनी जमीन 40 हजार रूपये बेच दी और आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली भेज दिया। दिल्ली आने के बाद गोविंद के सामने रहने और खाने की समस्या खड़ी हो गई तब उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। गोविंद रोजाना ट्यूशन पढ़ाने के साथ-साथ 18 घंटे तक पढ़ाई करते और कई बार तो पैसे बचाने के लिए खाना भी नही खाते थे। गोविंद आईएएस एग्जाम के सब्जेक्ट चुनने के पीछे भी दिलचस्प कहानी बताते है वे कहते है कि मेरे एक दोस्त के पास इतिहास की किताबें थी, इसलिए मैने इतिहास विषय चुना। इसके अलावा वे साइंस के स्टूडेंट थे तो उनकी इस विषय पर भी अच्छी पकड़ थी।
गोविंद बताते है कि जब उन्होंने आईएएस का एग्जाम दिया तो रिजल्ट के पहले उनके पिता चिंता के कारण कई रात सो नही पाए थे। और जब रिजल्ट आया तो सबकी आंखों में आँसू आ गये क्योंकि एक रिक्शा चालक के बेटे ने इतिहास में अपना नाम दर्ज कर दिया था। गोविंद ने पहले ही प्रयास में आईएएस के एग्जाम में ऑल इंडिया में 48वीं रैंक हासिल की। वे अपनी सफलता का श्रेय अपने पिता और अपनी बहनों को देते है। खासकर बड़ी बहन को जिन्होंने माँ की मौत के बाद परिवार को संभाला और इसके लिए अपनी पढ़ाई तक छोड़ दी।
गोविंद अपने संघर्ष के दिनों में बात करते हुए बताते है कि अगर वो बुरे दिन नही होते तो वे सफलता का मतलब कभी समझ नही पाते। फिलहाल गोविंद नागालैंड में रेवेन्यू एंड डिजास्टर मैनेजमेंट में ऑफिसर है।


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