सरकार ने संसद में बताया कि जनजातीय छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए स्वीकृत एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूलों (EMRS) में से लगभग एक-तिहाई अभी तक चालू नहीं हो पाए हैं। इसकी मुख्य वजह स्कूल भवनों का अधूरा निर्माण है। यह भूमि की अनुपलब्धता, अतिक्रमण, कानूनी विवाद और वन भूमि उपयोग की अनुमति न मिलने के कारण रुका हुआ है।

पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले जनजातीय बच्चों को कक्षा 6 से 12 तक शिक्षा प्रदान करने के लिए 728 एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूलों की स्थापना का लक्ष्य रखा है। अब तक 721 स्कूलों को स्वीकृति मिली है, जिनमें से 477 स्कूल चालू हो चुके हैं, जबकि 245 स्कूल अब भी गैर-कार्यात्मक हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सवाल के जवाब में जनजातीय कार्य राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने यह जानकारी दी।
एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल निर्माण में देरी के मुख्य कारण
मंत्री ने बताया कि स्कूलों के भवन निर्माण में देरी का सबसे बड़ा कारण राज्यों द्वारा विवाद रहित उपयुक्त भूमि उपलब्ध न कराना है। इसके अलावा, स्थानीय अतिक्रमण और विरोध, वन भूमि उपयोग की अनुमति मिलने में देरी, कानूनी विवाद और विद्यालय तक पहुंचने के लिए सड़क की अनुपलब्धता जैसी समस्याओं के कारण भी काम धीमा या बाधित हो गया है।
विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी राज्यों में, भूमि अक्सर सशर्त उपहार पत्रों (Gift Deeds) के माध्यम से दी जाती है, जिससे निर्माण प्रक्रिया में अतिरिक्त जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं। साथ ही, कुछ क्षेत्रों की दुर्गम भौगोलिक स्थिति और खड़ी ढलानों वाली भूमि स्कूल निर्माण के लिए अनुपयुक्त साबित हो रही है।
शिक्षा की गुणवत्ता पर भारी बजट प्रबंधन
एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूलों में प्रत्येक स्कूल में अधिकतम 480 छात्रों के लिए सीटें होती हैं, जहां 31 शिक्षकों के पद स्वीकृत किए गए हैं, जिससे औसत शिक्षक-छात्र अनुपात 15.5:1 रहता है। हाल ही में लोकसभा में प्रस्तुत सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर स्थायी समिति की रिपोर्ट में EMRS योजना के तहत स्वीकृत बजट के उपयोग में देरी की बात भी सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए 5,943 करोड़ रुपये और 2024-25 के लिए 6,399 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए थे, लेकिन 17 फरवरी 2025 तक केवल 2,471.81 करोड़ और 4,748.92 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए इस योजना के तहत 7,088.60 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है, जो जनजातीय कार्य मंत्रालय के कुल बजट का 47% हिस्सा है। गौरतलब हो कि जनजातीय छात्रों की शिक्षा को सशक्त बनाने के लिए एकलव्य मॉडल स्कूलों का सफल संचालन बेहद आवश्यक है। हालांकि, भूमि विवाद, निर्माण कार्यों में देरी और बजटीय धनराशि के धीमे उपयोग जैसी समस्याएँ इस योजना की प्रगति को प्रभावित कर रही हैं। सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे ताकि इन स्कूलों को शीघ्र चालू किया जा सके और जनजातीय बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।


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