Easter Sunday 2025: भारत में विभिन्न धर्मों के लोगों का वास है। यहां हिन्दू बाहुल्य होने के साथ ही सिख, मुस्लिम, ईसाई और बौद्ध धर्म को मानने वाले सौहाद्र से रहते हैं। विभिन्न धर्मों के लोग विभिन्न प्रकार के त्योहार भी मनाते हैं। आज ईस्टर संडे है। ईसाई धर्म में सबसे प्रमुख और पवित्र त्योहारों में से एक है ईस्टर संडे।

आज हम जानेंगे ईसाई धर्म के अनुयायी ईस्टर क्यों मनाते हैं। इसे मनाने के पीछे मान्यता या इतिहास क्या है। साथ ही हम जानेंगे कि ईसाई धर्म के लोगों के लिए ईस्टर कितना महत्व रखता है और भारत में ईस्टर संडे कैसे मनाया जाता है। लेकिन आइए सबसे पहले आपको बता दें कि यह त्योहार खुशी का त्योहार है और बड़े ही हर्सोल्लास के साथ पर्व को मनाया जाता है।
ईस्टर संडे क्यों मनाया जाता है?
आम भाषा में कहें तो यह पर्व प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान (Resurrection) की स्मृति में मनाया जाता है। यह त्योहार अच्छाई की बुराई पर विजय और जीवन के नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है। ईस्टर संडे हर वर्ष मार्च के अंत या अप्रैल के आरंभ में मनाया जाता है। इसका दिन हर साल बदलता है, क्योंकि यह पूर्णिमा के बाद आने वाले पहले रविवार को मनाया जाता है। ईस्टर संडे एक ऐसा पर्व है जो न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्व रखता है बल्कि इसमें पारिवारिक और सामाजिक रंग भी देखने को मिलते हैं।
ईस्टर संडे 2025 में कब मनाया जा रहा है?
ईस्टर संडे के दिन चर्च में विशेष प्रार्थनाएं आयोजित की जाती हैं। इस दौरान विशेष रूप से मोमबत्तियां जलाई जाती हैं और लोग अपने प्रियजनों के साथ ईस्टर के पर्व को हर्षोल्लास से मनाते हैं। 2025 में ईस्टर संडे 20 अप्रैल को मनाया जाएगा। यह दिन पवित्र सप्ताह (Holy Week) के अंतिम दिन के रूप में आता है और गुड फ्राइडे के ठीक दो दिन बाद पड़ता है। यह सप्ताह प्रभु यीशु के बलिदान, उनकी पीड़ा और अंततः उनके पुनर्जीवित होने की पूरी गाथा को दर्शाता है। इस लेख में हम जानेंगे कि ईस्टर संडे की तिथि कैसे तय होती है, इसका ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व क्या है और इसे किस प्रकार उत्सव के रूप में मनाया जाता है। साथ ही हम यह भी जानेंगे कि भारत और दुनिया भर में लोग इस पर्व को कैसे मनाते हैं।
ईस्टर संडे का इतिहास क्या है?
इस साल ईस्टर संडे 20 अप्रैल को मनाया जाएगा। यह तिथि वसंत ऋतु की पहली पूर्णिमा के बाद आने वाले पहले रविवार को निर्धारित होती है। ईस्टर का इतिहास बाइबिल से जुड़ा है। यह उस दिन की याद दिलाता है जब यीशु मसीह को सूली पर चढ़ाए जाने के तीन दिन बाद पुनर्जीवित किया गया था। माना जाता है कि शुक्रवार को उन्हें सूली दी गई (जिसे गुड फ्राइडे कहा जाता है) और रविवार को उनका पुनरुत्थान हुआ। यही दिन 'ईस्टर संडे' कहलाता है। यीशु मसीह के अनुयायियों ने जब उनके कब्र को खाली पाया और स्वर्गदूतों ने घोषणा की कि 'वह जीवित हो गए हैं', तब से ईस्टर संडे को जीवन की नई शुरुआत और उम्मीद के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा।
ईस्टर संडे कैसे मनाया जाता है?
ईस्टर संडे के दिन चर्च सेवाएं की जाती हैं। विशेष प्रार्थना सभाओं के आयोजन के साथ ही बाइबिल पाठ और गान होते हैं। ईस्टर संडे के दिन ईस्टर अंडा का खास महत्व है। बच्चे रंग-बिरंगे अंडों को ढूंढ़ते हैं। मान्यताओं के अनुसार, अंडा नए जीवन का प्रतीक होता है। ईस्टर संडे के दिन ईस्टर बनी, एक कल्पनात्मक खरगोश जो बच्चों को चॉकलेट और उपहार देता है, बनाया जाता है।
ईस्टर संडे के दिन यदि खान-पान की बात करें तो इस दिन लोग खास भोजन बनाते हैं जैसे मीठे केक, चॉकलेट अंडे, रोस्टेड मांस आदि। ईस्टर के दिन पारिवारिक समय के दौरान परिजन साथ बैठकर भोजन करते हैं और त्योहार का आनंद उठाते हैं।
भारत में ईस्टर का उत्सव कहां-कहां मनाते हैं?
भारत के केरल, गोवा, मुंबई, नागालैंड, मिजोरम और मेघालय जैसे राज्यों में ईस्टर बड़े उत्साह से मनाया जाता है। गिरजाघरों यानी चर्चों में को सुंदर फूलों और रोशनी से सजाया जाता है और आधी रात को प्रार्थना सभाएं होती हैं। यहां ईस्टर संडे को केवल एक धार्मिक पर्व नहीं माना जाता, बल्कि इसे जीवन में आशा, नया आरंभ और अच्छाई की जीत का प्रतीक भी माना जाता है।


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