राज्यसभा में कांग्रेस सांसद रजनी अशोकराव पाटिल ने मंगलवार को मेट्रो शहरों में बढ़ती शिक्षा लागत और सरकारी स्कूलों की बिगड़ती स्थिति पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने शिक्षा को सभी के लिए सुलभ बनाने के उद्देश्य से शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए निर्धारित प्रावधान को सख्ती से लागू करने की मांग की।

हर साल नर्सरी व एलकेजी के लिए 2 लाख तक फीस
कांग्रेस सांसद रजनी अशोकराव पाटिल ने कहा कि शिक्षा मौलिक अधिकार है, लेकिन यह अब आम लोगों की पहुंच से बाहर होती जा रही है। पाटिल ने हालिया सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए कहा कि माता-पिता एलकेजी और नर्सरी शिक्षा के लिए हर साल औसतन 40,000 रुपये से 2 लाख रुपये तक खर्च कर रहे हैं।
इसके अलावा, ट्यूशन जैसी अतिरिक्त शिक्षा लागत मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के लिए भारी आर्थिक बोझ बन रही है, जिससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एक विशेषाधिकार बन गई है। उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों को किफायती शिक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया था, लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी, प्रशिक्षित शिक्षकों की अनुपलब्धता और अपर्याप्त संसाधनों के कारण इन स्कूलों में दाखिले लगातार घट रहे हैं।
सरकारी स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव
उन्होंने कहा कि अभिभावक, चाहे आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे हों, फिर भी निजी स्कूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं, क्योंकि सरकारी स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। सरकारी स्कूलों में इन्हीं अभाव के कारण अभिभावक निजी स्कूलों का रूख कर रहे हैं। सरकारी विद्यालयों में पेयजल, कार्यशील कक्षाएं और डिजिटल टूल जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की कमी के कारण अभिभावकों के सामने दो ही विकल्प बचते हैं-या तो भारी शुल्क देकर निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाएं या कम संसाधनों वाले सरकारी स्कूलों में उनका भविष्य दांव पर लगाएं।
समस्या का हर RTE से...
इस समस्या को हल करने के लिए, पाटिल ने बताया कि 2009 में यूपीए सरकार ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) लागू किया, जिसमें निजी स्कूलों में 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समुदायों के बच्चों के लिए आरक्षित की गईं। उन्होंने कहा कि इस कानून से इन बच्चों को भी संपन्न परिवारों के बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला।
हालांकि, कई राज्यों में इस प्रावधान का सही से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। सरकार द्वारा स्कूलों को दी जाने वाली वित्तीय प्रतिपूर्ति में देरी होती है और स्कूल प्रशासन भी ईडब्ल्यूएस छात्रों के प्रवेश में बाधा डालता है। उन्होंने कहा कि इस प्रावधान के प्रभावी क्रियान्वयन से शिक्षा अधिक समावेशी बनेगी और सामाजिक असमानता को कम करने में मदद मिलेगी।


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