महाराष्ट्र में अब कक्षा 1 से 5 के बच्चे अब हिन्दी को वैकल्पिक भाषा के रूप में चुन सकते हैं। दरअसल, हिंदी को तीसरी अनिवार्य भाषा बनाने के फैसले पर चौतरफा विरोध झेलने के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने मंगलवार को बड़ा बदलाव करते हुए यह घोषणा की कि हिंदी अब राज्य के स्कूलों में अनिवार्य नहीं बल्कि वैकल्पिक भाषा होगी।

राज्य के शिक्षा मंत्री दादाजी भूसे ने कैबिनेट बैठक के बाद कहा, "अनिवार्य शब्द को हटाया जाएगा... तीन-भाषा फॉर्मूला जारी रहेगा, लेकिन यदि किसी कक्षा में पर्याप्त संख्या में छात्र किसी अन्य भाषा की मांग करते हैं, तो स्कूल को वह विकल्प उपलब्ध कराना होगा।"
क्या है मामला?
बीते 16 अप्रैल को सरकार द्वारा जारी आदेश में यह कहा गया था कि कक्षा 1 से 5 तक हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य किया जाएगा। इस आदेश के तुरंत बाद, राज्य भर से राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। खासकर तब यह विवाद और बढ़ गया जब तमिलनाडु ने भी ऐसे ही एक केंद्रीय निर्णय के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन शुरू किया।
राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पहले ही इस निर्णय का बचाव कर रहे थे। उन्होंने कैबिनेट को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत तीन-भाषा फॉर्मूले की जानकारी दी और बाद में स्पष्ट किया कि "हिंदी अब अनिवार्य नहीं बल्कि एक वैकल्पिक विषय होगी।"
मालूम हो कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस निर्णय की आलोचना करते हुए कहा था, "हिंदी थोपे जाने के खिलाफ भारी विरोध के बाद, महाराष्ट्र सरकार पीछे हटी है और अब केवल मराठी को अनिवार्य बताया गया है। यह साफ दर्शाता है कि सार्वजनिक आलोचना से घबराकर यह फैसला बदला गया है।"
इसके जवाब में फडणवीस ने कहा, "एनईपी ने कभी किसी भाषा को अनिवार्य नहीं किया, बल्कि अंग्रेज़ी के अलावा दो भारतीय भाषाओं को पढ़ने की सलाह दी थी। महाराष्ट्र में हिंदी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, संस्कृत या किसी भी छात्र की पसंद की भाषा को तीसरी भाषा के रूप में चुना जा सकता है। सवाल यह है कि बहुभाषिकता को लेकर इतनी आपत्ति क्यों?"
हिंदी थोपने की कोशिश
राज्य में विपक्षी पार्टियों ने इस फैसले को "हिंदी थोपने की कोशिश" करार दिया था। महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (राज ठाकरे) ने सबसे पहले और तीव्र विरोध जताया, जबकि शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने भाजपा पर भाषाई विभाजन फैलाने का आरोप लगाया। कांग्रेस नेता विजय वडेट्टीवार ने इसे "मराठी भाषा पर हमला" और राज्य की स्वायत्तता को कमजोर करने की साजिश बताया।
महाराष्ट्र के भाषाई स्वाभिमान के इतिहास को देखते हुए फडणवीस सरकार ने तेजी से रुख बदलते हुए राजनीतिक नुकसान से बचने की कोशिश की है। विशेष रूप से मुंबई जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जहां मराठी बनाम गैर-मराठी की राजनीति लंबे समय से प्रभावशाली रही है, वहां बीजेपी को यह निर्णय महंगा पड़ सकता था।


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