IPCC Report on Global Warming: जलवायु परिवर्तन का मुद्दा पूरे विश्व के लिए आज एक चिंता का विषय बन चुका है। यूं तो जलवायु परिवर्तन को लेकर विश्व के कई देश अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं और अन्य देशों में नागरिकों को जागरूक करने की दिशा में भी तमाम प्रयास चलाए जा रहे हैं। सोमवार को जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल ने एक नवीनतम रिपोर्ट जारी की है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (Intergovernmental Panel on Climate Change or IPCC) एक अन्तर सरकारी वैज्ञानिक निकाय है। यह संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक पैनल है, जो जलवायु में बदलाव और ग्रीनहाउस गैसों पर अनुसंधान कर रिपोर्ट तैयार करता है। वैज्ञानिकों ने ईशारा किया है कि लगातार बढ़ रहे समुद्र के जलस्तर के कारण भारत के कई बड़े तटीय शहरों को क्षति पहुंच सकता है। जानिए पूरी रिपोर्ट विस्तार से-
जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) की इस नवीनतम रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने कहा कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और मानवों द्वारा की जा रही जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के लिए कई अन्य प्रभावी विकल्प उपलब्द्ध हैं, जिन्हें अपनाकर जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण पाया जा सकता है। मालूम हो कि जलवायु परिवर्तन की दिशा में लगातार कार्य करने के लिए इस संस्था को 2007 में शांति नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, आईपीसीसी के अध्यक्ष होसुंग ली ने कहा, "प्रभावी रूप से जलवायु परिवर्तन को कम करने की दिशा में की जा रही कार्रवाई को मुख्यधारा में लाने से न केवल प्रकृति और लोगों को होने वाले नुकसान और क्षति को कम किया जा सकेगा बल्कि यह व्यापक लाभ भी प्रदान करेगा।" यह रिपोर्ट भविष्य में जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण पाने की दिशा में किए जा रहे कार्यों को रेखांकित करती है। यदि समय रहते कार्य किए जाए तो हम एक सुरक्षित भविष्य की ओर अग्रसर हो सकेंगे।
क्या है वर्तमान परिदृश्य
जीवाश्म इंधन पर दुनिया की निर्भरता से मानवजनित उत्सर्जन पूरे विश्व के जलवायु पर असर डाल रहा है। बीते दस वर्षों में वैश्विक सतही तापमान, औद्योगिक तापमान से 1.1 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंचने के साथ ही मानवीय गतिविधियों से ग्लोबल वार्मिंग हुई है। इसके परिणामस्वरूप तीव्र गति से मौसमी परिवर्तन आया है, जिससे दुनिया के हर क्षेत्र में प्रकृति और लोगों पर तेजी से खतरनाक प्रभाव पड़ा है। ग्लोबल वार्मिंग में हो रही वृद्धि के परिणामस्वरूप विश्वभर में इसके खतरनाक रूप देखे जा रहे हैं। अधिक तीव्र गर्मी की लहरें या हीटवेव्स, भारी बारिश और मौसम की अन्य चरम सीमाएं मानव स्वास्थ्य और पारिस्थितिक तंत्र के लिए जोखिमों को और बढ़ा देती हैं। हर क्षेत्र में भीषण गर्मी से लोगों के मरने की घटनाएं भी सामने आई हैं।
तेजी से बढ़ती गर्मी के साथ भोजन और पानी की कमी बढ़ने की भी उम्मीद है। जब जलवायु परिवर्तन से होत रहे प्रभाव अन्य प्रतिकूल घटनाओं, जैसे कि महामारी के साथ जुड़ जाते हैं, तो उन्हें प्रबंधित करना और भी मुश्किल हो जाता है। 1970 के बाद से पिछले 2000 वर्षों में वैश्विक सतह का तापमान किसी भी अन्य 50-वर्ष की अवधि की तुलना में तेजी से बढ़ा है। बढ़ते तामपान के कारण इसका असर पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ रहा है। इसका असर सतह से लेकर समुद्र तक तेजी से फैल रहा है। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव व्यापक हैं और यह आर्थिक क्षति का कारण बन रहे हैं।

स्विजरलैंड के इंटरलेकन में एक सप्ताह के लंबे सत्र के दौरान स्वीकृत की गई यह रिपोर्ट, उन सभी बिंदुओं की ओर ध्यान आकर्षित करती है जो हम पहले से ही अनुभव कर रहे हैं। संभवतः ये भविष्य में भी जारी रहेंगे। इस समय पर उचित दिशा में कदम उठाए जाने से न केवल जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण पाया जा सकता है बल्कि यह दुनिया के लिए आवश्यक परिवर्तनकारी परिवर्तन हो सकता है। इस रिपोर्ट के अन्य 93 लेखकों में से एक अदिति मुखर्जी ने कहा, जलवायु के लिए न्याय महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन लोगों ने जलवायु परिवर्तन की दिशा में कार्य किया है, वे अंततः इससे प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने कहा, दुनिया की लगभग आधी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जो जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। पिछले एक दशक में अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में बाढ़, सूखा और तूफान से होने वाली मौतों की संख्या 15 गुना अधिक थी।
जलवायु परिवर्तन की मौजूदा परिस्थिति से आवश्यक परिस्थिति के बीच की खाई को कम करने के लिए त्वरित कार्रवाई आवश्यकता है। पूर्व-औद्योगिक स्तरों से ऊपर 1.5 डिग्री सेल्सियस तक वार्मिंग को बनाए रखने के लिए सभी क्षेत्रों में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में गहरी, तेजी और निरंतर कटौती की आवश्यकता है। यदि तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना है, तो उत्सर्जन को अब तक कम किया जाना चाहिए ताकि 2030 तक इसे लगभग आधा किया जा सके।
ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को तेजी से कम करने के लिए पर्याप्त वैश्विक पूंजी उपलब्द्ध है। हालांकि ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण पाने की दिशा में यदि मौजूदा बाधाओं को कम कर दिया जाए तो ये संभव है। वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जलवायु निवेश के लिए वित्त बढ़ाना एक महत्वपूर्ण कदम है। सरकारें, सार्वजनिक धन और निवेशकों को स्पष्ट संकेतों के माध्यम से, इन बाधाओं को कम करने की दिशा में प्रयास कर सकती है। वहीं निवेशक, केंद्रीय बैंक और वित्तीय नियामक भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं। यदि उचित दिशा में कार्य किया दाए और अधिक व्यापक रूप से नीतियों को लागू किया जाए, ऐसे कई आजमाए और परखे हुए नीतिगत उपाय हैं, जो गहरे उत्सर्जन में कमी और जलवायु संतुलन को प्राप्त करने के लिए काम कर सकते हैं। प्रभावी और न्यायसंगत जलवायु कार्रवाई के लिए राजनीतिक प्रतिबद्धता, समन्वित नीतियां, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, पारिस्थितिकी तंत्र प्रबंधन और समावेशी शासन सभी महत्वपूर्ण हैं।
... तो क्या डूब जायेंगे मुंबई, चेन्नई और मैंगलोर के कई हिस्से
ग्लोबल वार्मिंग के कारण पूरा विश्व प्रभावित हैं। लेकिन इससे भारत में क्या असर पड़ेगा यह जान लेना भी महत्वपूर्ण है। समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण चेन्नई, मुंबई, मैंगलोर,विशाखापट्टनम जैसे तटीय शहरों के बुनियादी ढांचे और कई अन्य बड़े खतरे में हैं। इसके लिए जलवायु परिवर्तन एक मुख्य कारण है। इन तटीय शहरों में समद्री जलस्तर के बढ़ने से शहर के कई हिस्से गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में समुद्री जल के तापमान में वृद्धि के कारण हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में अधिक चक्रवात आने की संभावना है। आगे जाकर चक्रवातों की तीव्रता पहले आ चुके चक्रवातों से भी अधिक हो सकती है। CO2 के घटते अनुपात से भारत के अन्य कई शहर और महानगर अधिक प्रदूषण की चपेट में आ सकते हैं।
दिल्ली, बेंगलुरु और गुरुग्राम जैसे बड़े शहरों में रहने वाले लोग पहले से ही सांस लेने में परेशानी का सामना कर रहे हैं। कई शहरों में बेमौसम बारिश, भीषण गर्मी और हवा में प्रदूषण की मात्रा में भी बढ़ोत्तरी देखी गई है। गर्मियों के मौसम में उत्तर भारत के कई शहरों में हीटवेव यानी गर्म लहरों की तीव्रता और अधिक बढ़ सकती है। हालांकि यदि हम CO2 के उत्सर्जन को सीमित करने में विफल रहे, तो फसल की खेती बुरी तरह प्रभावित होगी और इससे देश में असीमित मूल्य वृद्धि हो सकती है। अप्रत्याशित वैश्विक जल चक्र से देश के कई हिस्से में मॉनसून का आना भी असंभव हो सकता है। देश में भीषण सूखा और जंगल की आग भी प्रमुख परिणाम हैं, जो हमें इस वक्त निकट भविष्य की ओर ईशारा कर रहे हैं।
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