बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के वैज्ञानिकों ने एक अनूठी तकनीक विकसित की है। इस तकनीक के अनुसार बैक्टीरिया की मदद से चंद्रमा पर इस्तेमाल होने वाली ईंटों में आई दरारों की मरम्मत की जा सकती है। यह तकनीक चंद्रमा के अत्यधिक तापमान परिवर्तनों और कठोर वातावरण के कारण होने वाले नुकसान को कम करने में सहायक हो सकती है।

पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार आईआईएससी के शोधकर्ताओं ने बताया कि चंद्र अभियानों का स्वरूप बदल रहा है। पहले केवल "फ्लाईबाय" मिशन होते थे, लेकिन अब नासा के आर्टेमिस मिशन जैसे प्रयासों के तहत चंद्रमा पर स्थायी आवास स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि, चंद्रमा का वातावरण अत्यधिक चुनौतीपूर्ण है। वहां तापमान एक ही दिन में 121 डिग्री सेल्सियस से -133 डिग्री सेल्सियस तक गिर सकता है, साथ ही सौर हवाओं और उल्कापिंडों का लगातार प्रहार भी होता रहता है। इस कारण वहाँ बनने वाली संरचनाओं की ईंटों में दरारें आ सकती हैं, जिससे उनका स्थायित्व प्रभावित हो सकता है।
बैक्टीरिया से ईंटों की मरम्मत का तरीका
आईआईएससी के वैज्ञानिकों ने 'Sporosarcina pasteurii' बैक्टीरिया, ग्वार गोंद (Guar Gum) और चंद्रमा की मिट्टी जैसे पदार्थ से बनी एक स्लरी तैयार की, जिसे दरारों में भरा गया। यह बैक्टीरिया पर्यावरण में मौजूद यूरिया को तोड़कर उसे कार्बोनेट और अमोनिया में बदल सकता है। ईंटों में मौजूद कैल्शियम, इस कार्बोनेट के साथ मिलकर कैल्शियम कार्बोनेट बनाता है, जो ग्वार गोंद के साथ मिलकर एक भराव और सीमेंटिंग एजेंट की तरह काम करता है। इससे दरारें भर जाती हैं और ईंटों की मजबूती बढ़ जाती है। इस अध्ययन को 'फ्रंटियर्स इन स्पेस टेक्नोलॉजीज' जर्नल में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि बैक्टीरिया से मरम्मत की गई ईंटें 100°C से 175°C तक के तापमान को सहन करने में सक्षम हैं।
ईंटों की मजबूती और भविष्य की योजनाएं
पीटीआई को दिए एक बयान में आईआईएससी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर कौशिक विश्वनाथन ने बताया, "चंद्रमा की सतह पर तापमान में भारी बदलाव लंबे समय में संरचनाओं पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।" वहीं प्रमुख शोधकर्ता अलोक कुमार ने कहा, "शुरुआत में हमें यह संदेह था कि बैक्टीरिया सिंटर्ड (sintered) ईंटों से चिपकेगा या नहीं, लेकिन हमने पाया कि यह न केवल स्लरी को ठोस कर सकता है बल्कि ईंटों से अच्छी तरह चिपक भी सकता है।" सिंटरिंग एक प्रक्रिया है जिसमें चंद्रमा की मिट्टी जैसी सामग्री को पॉलीविनाइल अल्कोहल (polyvinyl alcohol) के साथ उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है, जिससे मजबूत ईंटें बनती हैं। हालाँकि, ऐसी ईंटें भंगुर होती हैं और यदि उनमें दरारें पड़ती हैं तो पूरी संरचना गिर सकती है।
बैक्टीरिया को अंतरिक्ष में भेजने की योजना
भारतीय विज्ञान संस्थान, आईआईएससी के वैज्ञानिकों ने पहले भी चंद्र और मंगल ग्रह जैसी मिट्टी से ईंटें बनाने में Sporosarcina pasteurii बैक्टीरिया का उपयोग किया था। अब, शोधकर्ता इस बैक्टीरिया के नमूने को अंतरिक्ष में भेजने की योजना पर काम कर रहे हैं। यह अध्ययन ISRO के गगनयान मिशन के तहत किया जा सकता है, जिससे अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी में इस बैक्टीरिया के विकास और व्यवहार को समझने में मदद मिलेगी।
गौरतलब हो कि चंद्रमा पर भविष्य में स्थायी मानव आवास स्थापित करने की दिशा में यह तकनीक बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। बैक्टीरिया-आधारित मरम्मत तकनीक से चंद्र संरचनाओं की उम्र बढ़ाई जा सकती है और निर्माण लागत में भी कमी आ सकती है। आईआईएससी का यह अनुसंधान अंतरिक्ष में मानव बस्तियों की स्थापना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


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