हिंदी दिवस पर भाषण हिंदी में कैसे लिखें (Speech On Hindi Diwas In Hindi 2020)

By Narendra Sanwariya

Hindi Diwas Speech In Hindi 2020: भारत में हिंदी दिवस 14 सितंबर को हर साल मनाया जाता है। दुनिया में हिंदी भाषा चौथी सबसे अधिक बोली जाने भाषा है। भारत में विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं, लेकिन सबसे ज्यादा हिंदी भाषा बोली, लिखी व पढ़ी जाती है। 14 सितंबर 1953 को पहली बार हिंदी दिवस मनाया गया, इस वर्ष हम 68वां हिंदी दिवस मना रहे हैं। हिंदी राष्ट्र होने की वजह से भारत को हिन्दुस्तान कहा जाता है। हिंदी दिवस पर लोग एक दूसरे को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं देते हैं। हिंदी दिवस पर भाषण प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती है, स्कूल कॉलेज में भी हिंदी दिवस पर भाषण और हिंदी दिवस पर निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। ऐसे में अगर आपको भी हिंदी दिवस पर भाषण (Speech On Hindi Diwas 2020) या हिंदी दिवस पर निबंध (Essay On Hindi Diwas) लिखना है, तो हम आपके लिए सबसे बेस्ट हिंदी दिवस पर लेख लेकर आए हैं। हिंदी दिवस पर भाषण का ड्राफ्ट देखकर आप आसानी से हिंदी दिवस पर भाषण लिख सकते हैं। आइये जानते हैं हिंदी दिवस पर भाषण (How To Write Hindi Diwas Speech), हिंदी दिवस पर निबंध (How To Write Hindi Diwas Essay) और हिंदी दिवस पर लेख (How To Write Hindi Diwas Article) कैसे लिखें...

 

हिंदी दिवस पर भाषण हिंदी में कैसे लिखें (Speech On Hindi Diwas In Hindi 2020)

हिंदी दिवस पर भाषण का ड्राफ्ट

यहां मौजूद सभी सम्माननीय माननीय अतिथिगण को मेरा प्रणाम,

मैं लविश सांवरिया, हिंदी दिवस पर मुझे यह अवसर देकर मैं धन्य हो गया

साथियों जैसे की हम जानते हैं, हम सब यहां हिंदी दिवस के उपलक्ष में यहां उपस्तिथ हुए हैं, हिंदी दिवस हर साल 14 सितंबर को मनाया जाता है। अंग्रेजी, स्पेनिश और मंदारिन के बाद हिंदी दुनिया में चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी दिवस पर हर साल, भारत के राष्ट्रपति दिल्ली में एक समारोह में, हिंदी भाषा में अतुलनीय योगदान के लिए लोगों को राजभाषा पुरस्कार से सम्मानित करते हैं।

हिंदी एक इंडो-आर्यन भाषा है, जिसे देवनागरी लिपि में भारत की आधिकारिक भाषाओं में से एक के रूप में लिखा गया है। हिंदी दिवस आधिकारिक भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए समर्पित है। साथ ही, इस दिन को उनकी सामान्य जड़ों और एकता की भारतीय आबादी के लिए एक देशभक्ति अनुस्मारक के रूप में मनाया जाता है। भारत में हिंदी एक मात्र ऐसी भाषा है, जिसे सबसे अधिक बोला, लिखा व पढ़ा जाता है।

हिंदी दिवस का इतिहास की बात करें तो 14 सितंबर, 1949 को, भारत की संविधान सभा ने हिंदी को नवगठित राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया। फिर निर्णय को स्वीकार कर लिया गया और यह 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान का हिस्सा बन गया। 1953 में पहली बार हिंदी दिवस मनाया गया। लोग जैसे राजेंद्र सिंह, हजारी प्रसाद द्विवेदी, काका कालेलकर, मैथिली शरण गुप्त, और सेठ गोविंद दास गोविंद। हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा बनाए जाने के पक्ष में कड़ी पैरवी की। भारत के संविधान की मूल अंतिम पांडुलिपि में बेहर राजेंद्र सिम्हा को उनके चित्रों के लिए जाना जाता है।

बहुत लोगों पता नहीं होता कि हिंदी दिवस कैसे मनाया जाता है ? तो मैं आपको बता दूं इस दिन भारत में स्कूल और कॉलेज हिंदी में साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रतियोगिताओं का आयोजन करते हैं जहाँ सभी छात्र भाग लेते हैं। देश के पहले प्रधान मंत्री, जवाहरलाल नेहरू ने 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने का फैसला किया। अधिकांश शिक्षण संस्थान की संगठित कविता, निबंध, और प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं और छात्रों को भाग लेने और भाषा का जश्न मनाने और इस पर गर्व करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। आप यादगार दिन मनाने के लिए कई साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ समारोह भी देख सकते हैं।

हिंदी भाषा के बारे में मैं आपको बताना चाहूंगा कि हिंदी भाषाओं के इंडो-यूरोपीय परिवार की इंडो-आर्यन शाखा से संबंधित है। अंग्रेजी के साथ हिंदी, भारत की आधिकारिक भाषा है। अनुच्छेद 343 के अनुसार, संघ की आधिकारिक भाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी। संघ के आधिकारिक उद्देश्य के लिए उपयोग किए जाने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। हिंदी वह भाषा थी जिसे स्वतंत्रता के संघर्ष के दौरान भारतीय नेताओं ने राष्ट्रीय पहचान के प्रतीक के रूप में अपनाया था। बारहवीं शताब्दी के बाद से हिंदी को साहित्यिक भाषा के रूप में उपयोग किया जाता है।

अंत में सभी का धन्यवाद करें

जय हिंद, जय भारत, भारत माता की जय....

हिंदी दिवस पर भाषण कैसे लिखें पढ़ें जानिए....

हिंदी दिवस स्पीच | हिंदी दिवस पर भाषण | Hindi Diwas Speech In Hindi 2020
 

हिंदी दिवस स्पीच | हिंदी दिवस पर भाषण | Hindi Diwas Speech In Hindi 2020

हिंदी दिवस समारोह आता है और हर बार अवसाद सा दे जाता है। लेकिन इस बार तो कोरोना की कृपा से न एक दिन का समारोह नसीब में है‚ न अवसाद ही नसीब में है। जो है सो सोशल मीडिया में है और वेबीनारों के ‘आभासी-भाषितों' में है! पिछले बरस तक हिन्दी दिवस के दिन सरकारी कार्यालयों व स्कूल-कॉलेजों में उत्सव का सा माहौल दिखा करता था। राजभाषा अधिनियम ने हिन्दी को एक निराले किस्म के कर्मकांड की भाषा में बदल दिया हैः राजभाषा अधिनियम के अंतर्गत हर कार्यालय में एक हिन्दी आफीसर भी होता है‚ जिसका काम अपने कार्यालय में हिन्दी में हुए कामकाज व अनुवाद आदि की रिपोर्ट बनाना होता है। इसी अवसर पर कार्यालयकर्मियों के बीच बहुत सी हिन्दी प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं.किसी हिन्दी विद्वान को आशीर्वाद देने के लिए बुलाया जाता है होता हैं। अनेक लोगों के लिए हिन्दी दिवस हिन्दी का मरसिया दिवस भी होता है कि अंग्रेजी बढ़ रही है‚ हिंदी घट रही है। हिन्दी दिवस हर बार इसी तरह आता है और चला जाता है और हिन्दी-मीडिया‚ हिन्दी-लेखक‚ हिन्दी-अघ्यापक व हिन्दी-चिंतक सबको ‘हतभाग्यता' का अहसास दे जाता है कि चलो‚ जब तक हिन्दी है‚ तब तक है‚ जब न होगी तो देखेंगे! इसीलिए जब कोई अन्य भाषा-भाषी हिन्दी को उसके बिना किसी कसूर के लात लगा देता है‚ तो भी किसी हिन्दी लेखक या चिंतक के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। जब यूपी में किसी बरस दस लाख और किसी बरस आठ लाख बच्चे दसवीं-बारहवी की परीक्षा में हिन्दी भाषा के पेपर में फेल हो जाते हैं‚ तो भी कोई कुछ नहीं सोचता मानो यह हिन्दी वालों की समस्या न होकर किसी और की समस्या हो। बोलचाल और लिखने का फर्क ॥ हिन्दी के साहित्यकार अपना ‘साहित्य' करते हैं‚ पत्रकार पत्रकारिता करते रहते हैं‚ अघ्यापक किसी तरह पढ़ाते व पास-फेल करते रहते हैं‚ मानो इन समस्याओं से उनका कोई आत्यंतिक संबंध न हो। इस बरस यूपी बोर्ड की दसवीं-बारहवीं की हिन्दी परीक्षा में जो बच्चे फेल हो गए‚ उनके बारे में एक परीक्षक ने बताया है कि इन छात्राों ने सही हिन्दी नहीं लिखी। किसी छात्रा ने हिन्दी में ‘आत्मविश्वास' लिखने की जगह अंग्रेजी में ‘कनफीडें़स' लिखा और इसमें भी ‘स्पेंलिग' की गलती की। इसी तरह जहां ‘यात्रा' शब्द लिखना था‚ वहां ‘सफर' शब्द लिखा और इस तरह की ‘गलत हिन्दी' लिखने के कारण वे फेल हुए। लेकिन घ्यान से देखें तो ऐसा इसलिए हुआ कि हिन्दी भाषा तेजी से बदल रही है और बोलचाल की हिन्दी और लिखने की हिन्दी में फर्क आ रहा है। बहुत से छात्र सोशल मीडिया अपने मोबाइल व फेसबुक पर जिस हिन्दी को लिखते-पढ़ते हैं‚ उसमें अंग्रेजी के बहुत से शब्द हिन्दी शब्दों के साथ मिक्स होते हैं‚ बातचीत की भाषा में बहुत से अंग्रेजी शब्द इस्तेमाल होते हैं‚ इसलिए जब लिखने की बात आती है‚ तो वे उसी भाषा में लिखते हैं‚ जिसके आदी हो चुके होते हैं। परीक्षकों की नजर में यह गलत हिन्दी होती है जबकि वे सब जानते हैं कि आजकल इसी तरह की हिन्दी चलती है॥। और‚ इन दिनों हिन्दी तो क्या अंग्रेजी तक की वर्तनी भी सही नहीं लिखी जाती। वहां भी बड़ी गड़बड़ है। ऐसा सब भाषाओं में होता दिखता है। इसका कारण है कि अनेक अपरिहार्य कारणों से हिन्दी या अन्य भाषाएं और अंग्रेजी तक बदल रही है‚ जिस तरह अंग्रेजी में बहुत से हिन्दी शब्द आने लगे हैं‚ उसी तरह हिन्दी में रोजमर्रा की बोलचाल के अंग्रेजी के शब्द आने लगे हैं। यह सब जानते हुए भी अगर परीक्षक छात्रों को दंडित किए बिना नहीं मानते‚ अगर सिर्फ स्पेलिंग के कारण फेल करते हैं‚ तो छात्र ही नहीं अधिकांश हिन्दी शिक्षक और प्रोफेसर तक परीक्षा में फेल हो सकते हैं। ॥ कारण यह है कि एक बड़ी पीढ़ी हिन्दी सीखने के प्रति गैर- जिम्मेदार रही है और बदलती हुई हिन्दी अपने लिए कुछ नये और बदले हुए मानक चाहती है‚ इसे किसी ने नहीं समझा। जिन्होंने बच्चों को हिन्दी में लिखने की जगह अंगेजी में अंग्रेजी शब्द ‘कनफीडेंस' को भी गलत लिखने के कारण फेल किया या ‘यात्रा' की जगह ‘सफर' (उर्दू) लिखने पर फेल किया वे दरअसल‚ अपने को ही तो फेल करते हैं क्योंकि वे हिंदी को बदलती तो देखते हैं लेकिन जब परीक्षक बनते हैं तो शुद्ध हिन्दीवादी बन जाते हैं! वे इस तरह डबल स्टैंड़र्ड़ अपनाते हैं! अंग्रेजी दुनिया भर की भाषाओं से हर साल बहुत सारे शब्द उधार लेती रहती है ओर अपने शब्द कोश में शामिल करती रहती है और हम यह देख खुश होते हैं कि अंग्रेजी की डिक्शनरी में हिंदी का रायता या परांठा ले लिया गया है। लेकिन इसी तर्क से और इसी तर्ज पर अगर हिन्दी अंग्रेजी के कुछ चलताऊ शब्द ले लेती है‚ तो हम हिन्दी की शुद्धतावादी लाठी से हांकने लगते हैं कि अंग्रेजी के शब्द क्यों लिए या क्यों लिखेॽ ऐसे शुद्धतावादी शिक्षक-परीक्षक भाषा के विकास के नियम तक को नहीं समझते कि हर भाषा दूसरी भाषाओं से शब्द लेती है और ताकतवर भाषा से शब्द लेकर अपनी ताकत को बढ़ती है। अगर परीक्षक इतना जानते तो फेल करने की जल्लादी न करते‚ बल्कि एक नई बनती हिन्दी भाषा को स्वीकार करते और उसके लिए नये मानक बनाते। ॥ हिन्दी वालों की समस्या हम हिन्दी वाले ही हैं‚ जो यों हिन्दी की परवाह नहीं करते औेर जैसे ही दूसरी भाषा के शब्द देखते हैं तो अपना शुद्धतावादी हथौड़ा चला देते हैं। यों हम हर रोज हिन्दी को बदलता देखते हैं‚ लेकिन उसके बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाते। जरूरत इस बात की है कि कम से कम हम इस बदलती हिन्दी को समझें और उसके हिसाब से अपने को ओर अपनी हिन्दी को अपडेट करें। बदलती हिन्दी के अनुसार अपने को बदलें‚ उसके व्याकरण‚ उसके शब्दकोष को बदलें और हिन्दी को उसके ‘नये अवतार' में स्वीकार करें।

हिंदी दिवस स्पीच | हिंदी दिवस पर भाषण | Hindi Diwas Speech In Hindi 2020

हिंदी दिवस स्पीच | हिंदी दिवस पर भाषण | Hindi Diwas Speech In Hindi 2020

किसी भी भाषा का जीवन समाज की जुबान पर टिका होता है। उसे प्राण वायु उस भाषा के लेखन से मिलती है। वह कहते हैं न कि जैसी खुराक‚ वैसा स्वास्थ्य‚ तो कोई भाषा अपने लिखित रूप में कितनी तरह से बरती जा रही है‚ इससे उसकी उम्र घटती-बढ़ती है। केवल मनोरंजन के लेखन से कोई भाषा दीर्घजीवी नहीं हो सकती। उसके लिए ज्ञान-विज्ञान‚ सूचना और संवाद की अद्यतन भाषा बने रहना जरूरी है। लेकिन हिन्दी की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि राजनीति की भाषा बन चुकी है। ॥ पिछले ५० वषाç की राजनीति पर निगाह डालें तो अटल बिहारी वाजपेयी‚ लालू प्रसाद यादव और नरेन्द्र मोदी-इन तीनों राजनेताओं की लोकप्रियता का आधार इनकी हिन्दी रही है। तीनों की अपनी विशिष्ट शैली है। तीनों के श्रोता वर्ग अलग-अलग हैं। अटल जी की अपनी अलग जमीन है। वे शुद्ध‚ सुसंस्कृत हिन्दी बोलने वालों में प्रतिनिधि राजनेता हैं। लेकिन लालू प्रसाद यादव और नरेन्द्र मोदी ठीक उनके उलट भदेस हिन्दी के नेता हैं। लालू बिहार और मोदी गुजरात की हिन्दी बोलते हैं। दोनों के उच्चारण में क्षेत्रीय प्रभाव पूरम्पूर है। इनका उदय राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर टेलीविजन के उस दौर में हुआ जब खबरों की कारोबारी दुनिया मनोरंजन के बाजार से होड़ लेने पर उतारू थी। दोनों की वक्तृत्व शैली और क्षमता का भरपूर दोहन न्यूज चैनलों ने किया है। लेकिन सभाओं और ड्राइंग रूम में पीटी जा रही तालियों की गूंज से राजनेता मजबूत होते हैं‚ भाषा मजबूत नहीं होती। ऐसा हम इन बीते दशकों में देख चुके हैं।

हिन्दी समाज का अरमान आसमान पर

जिन तीन राजनेताओं का जिक्र किया जा रहा है‚ उनमें से एक प्रधानमंत्री रह चुके हैं। दूसरे अभी प्रधानमंत्री हैं। जब ये दोनों राजनेता प्रधानमंत्री बने तो हिन्दी समाज में उत्साह की लहर दौड़ गई। दोनों के शपथ-ग्रहण के साथ ही हिन्दी को विश्व भाषा और यूनेस्को की भाषा बनाने के अरमान हिन्दी समाज में आसमान में तैरने लगे। लेकिन दुर्भाग्य कि दोनों प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में हिन्दी की जमीनी सचाई नहीं बदली। ॥ इतिहास गवाह है कि जो भी भाषा सत्ता के भरोसे रही है‚ वह जमीनी स्तर पर कमजोर हुई है। जो लोक में बहुविध प्रयोग में रही है‚ वही फली-फूली और मजबूत होती गई है। हिन्दी को किसी दरबार ने प्रश्रय नहीं दिया था। इसे बाजार ने बढ़ाया था। यह व्यापारियों के साथ उत्तर से दक्षिण भारत तक पसरी। अभी भी हिन्दी की जो स्वीकार्यता है‚ वह किसी संवैधानिक दबाव से नहीं‚ राजनीतिक ताकत से नहीं‚ बाजार की जरूरत से है। लेकिन सवाल है कि क्या बाजार किसी भाषा को सम्मान और अमरत्व भी दे सकता हैॽ नहीं। क्योंकि बाजार ठहराव से नहीं चल सकता। वह बदलती मांगों से ताकत पाता है। हर नई पीढ़ी अपने हिसाब से अपनी दुनिया बनाती है। उसमें न केवल उसकी जरूरतें बदलती और विकसित होती हैं‚ बल्कि उनके अनुरूप भाषा भी घिसती और बदलती जाती है। इसी प्रक्रिया में लंबे समय बाद भाषा बदल जाती है। संस्कृत‚ लैटिन‚ फारसी तो छोडि़ए‚ क्या बांग्ला‚ कन्नड़ जैसी भाषाएं भी अब वही हैं‚ जो सौ-दो सौ साल पहले थींॽ नहीं। हिन्दी-उर्दू क्या वही हैं‚ जो सौ-डेढ़ सौ साल पहले थींॽ नहीं।

पुरानी पीढ़ी कहती है‚ भाषा बिगड़ रही है। नई पीढ़ी कहती है‚ भाषा बदल रही है। हमारे लिए देखना जरूरी है कि बदलाव किस तरह का हैॽ वह नया कुछ जोड़ रहा है या घटा रहा हैॽ भारतेंदु हरिश्चन्द्र जब कह रहे थे कि ‘हिन्दी नई चाल में ढली' तो वाकई उस समय हिन्दी में लेखन के स्तर पर बहुत कुछ सकारात्मक घटित हो रहा था। श्रोताओं को पाठक में तब्दील करने की ही मुहीम नहीं छिड़ी हुई थी‚ बल्कि उनके लिए उपयोगी और अनुकूल पाठ-सामग्री भी तैयार की जा रही थी। कविता सुनकर झूमने वाले समाज के दिमाग में यह बात डाली जा रही थी ज्ञान और हैसियत के लिए पढ़ने का हुनर होना जरूरी है। जो नये-नये पाठक बन रहे थे‚ उनको अपनी भाषा से जोड़े रखने के लिए विविध विषयों पर विविध शैलियों में लेखक लिख रहे थे। पत्रकार अपने पाठकों को भरमाने का काम नहीं कर रहे थे। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्हें जागरूक बनाने का काम कर रहे थे। हम बीसवीं शताब्दी के पहले बीस वर्ष की हिन्दी से इक्कीसवीं सदी के पहले बीस वर्ष की हिन्दी से तुलना करें तो पाएंगे कि यह भाषा विपन्न हुई है। तब ज्यादा संपन्न थी। ऐसा क्यों हुआ हैॽ

बाजार से मिली ताकत

पिछले बीस वर्षों में एक दशक से अधिक का समय अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्रीत्व का दौर है। इस दौरान हम हिन्दी के लिए सरकारी ताकत‚ वैश्विक हैसियत बढ़ाने को ज्यादा उत्सुक रहे हैं। लेकिन इन दो दशकों में हिन्दी को जो भी ताकत और ऊर्जा मिली है‚ वह सरकार से नहीं‚ बाजार से मिली है। आपातकाल के बाद की परिस्थितियों में धीरे-धीरे हिन्दी जिस तरह बेबस और धूमिल पड़ती जा रही थी‚ वह बीसवीं शताब्दी के बीतने-बीतने तक नये मध्यवर्ग और नव-शिक्षित दलित-पिछड़े वर्ग से नई ऊर्जा पा रही थी। यह वही नौजवान पीढ़ी थी जो ज्ञान‚ सूचना और स्वस्थ मनोरंजन के लिए नये तरह का साहित्य‚ नये तरह का सिनेमा चाह रही थी। जिसे सोशल मीडिया का बल मिल चुका था। वह अब मुंह जोहने वाली पीढ़ी नहीं थी। अपनी बात खुलकर कहने और लिखने वाली पीढ़ी थी। उसके पास खारिज करने की ऐसी ताकत थी‚ जिससे उसने भाषा को उत्पाद में बदलने वालों को मजबूर किया कि वे उसकी जरूरतों के अनुकूल ढले। बावजूद इसके हिन्दी समाज का बड़ा तबका अभी भी दूसरों का मुंह जोहने का अभ्यस्त है। वह जितनी जल्दी समझ ले कि उसकी भाषा की ताकत किसी नेता के हिन्दी भाषण में नहीं है‚ उतना अच्छा। ॥ हिन्दी की असली ताकत हिन्दी माध्यम की स्कूली किताबों में है‚ प्रतियोगी परीक्षाओं के हिन्दी माध्यम में होने में है‚ ज्ञान-विज्ञान और समसामयिक विषयों पर हिन्दी में होने वाले समृद्ध लेखन में है‚ हिंदी में स्वस्थ और सच्ची पत्रकारिता के होने में है‚ अच्छे समाज के सपने से जुड़े सिनेमा और संगीत में है‚ अन्य भारतीय भाषाओं से मैत्री में है-यह बात समझकर ही हम हिन्दी को नवजीवन दे सकते हैं॥। द॥ इतिहास गवाह है कि जो भी भाषा सत्ता के भरोसे रही है‚ जमीनी स्तर पर कमजोर हुई है। जो लोक में बहुविध प्रयोग में रही है‚ वही फली-फूली और मजबूत होती गई है। हिन्दी को किसी दरबार ने प्रश्रय नहीं दिया था।

हिंदी दिवस स्पीच | हिंदी दिवस पर भाषण | Hindi Diwas Speech In Hindi 2020

हिंदी दिवस स्पीच | हिंदी दिवस पर भाषण | Hindi Diwas Speech In Hindi 2020

27 सितम्बर 2014 को जब नरेन्द्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र की महासभा को हिन्दी में संबोधित किया तो राष्ट्र का हिन्दी प्रदेश खुशी से झूम उठा था। हालांकि उनके पहले 1977 में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी भी एक बार वहां अपना भाषण हिन्दी में दे चुके थे। लेकिन तब वे सिर्फ विदेश मंत्री थे। २७ सितम्बर के संबोधन के संबंध में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी बताया था कि बतौर मंत्री एक बार उन्होंने भी वहां हिन्दी में संबोधन किया था। प्रधानमंत्री सहित पार्टी के इन वरिष्ठ नेताओं के हिन्दी प्रेम और पार्टी के अतीत ने लोगों के बीच एक नई आशा जगाई। लोगों को लगा कि यह है एक हिन्दीवादी सरकार जो राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी की पैठ मजबूत करेगी। वे संयुक्त राष्ट्र के उस संबोधन को ले कर बेहद उत्साहित थे। उनके लिए ऐतिहासिक क्षण था‚ जब हमारे प्रधानमंत्री ने पूरी दुनिया को संदेश दिया था कि देखो‚ यह है हमारी मातृ भाषा। यह है पचास करोड़ लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली जुबान। और अपनी बात हम अपनी इसी जुबान में बोलेंगे। दुनिया वालो‚ अगर तुम्हें इतनी बड़ी आबादी से अपना संवाद स्थापित करना है‚ तो तुम्हें इसे सुनना होगा। हिन्दी प्रेमियों ने माना कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस भाषा का मान-सम्मान बढ़ा। और अब देश के सरकारी कामकाज में भी हिन्दी का प्रसार होगा। प्रधानमंत्री भी रु के नहीं। अगले ही हफ्ते 3 अक्टूबर से रेडियो पर उनका मशहूर कार्यक्रम ‘मन की बात' शुरू हुआ जिसमें वे देशवासियों को नियमित संबोधित करते हैं। उनका यह संबोधन भी हिन्दी में ही होता है। प्रधानमंत्री के इन निजी प्रयासों के अलावा‚ हिन्दी को राजभाषा के रूप में और प्रभावी बनाने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ी पहल की। पूरे देश को क‚ ख और ग तीन श्रेणियों में बांटा गया। क श्रेणी में वे दस राज्य रखे गए‚ जो मुख्य रूप से हिन्दीभाषी हैं- बिहार‚ छत्तीसगढ़‚ हरियाणा‚ हिमाचल प्रदेश‚ झारखंड‚ मध्य प्रदेश‚ मणिपुर‚ राजस्थान‚ उत्तराखंड तथा केंद्रशासित राज्य दिल्ली और अंडमान निकोबार। ख श्रेणी में वे राज्य रखे गए‚ जहां हिन्दी चलती है‚ लेकिन उनकी अपनी भी एक मजबूत भाषा है। इनमें महाराष्ट्र‚ गुजरात और पंजाब शामिल किए गए। उत्तर पूर्व तथा दक्षिण के जिन प्रदेशों को हिन्दी में सरकारी काम करने में ज्यादा मुश्किल होती है‚ उन्हें ग श्रेणी में रखा गया।

राजभाषा समिति के निर्देश

राजभाषा समिति ने केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों को निर्देश जारी किया कि उनके या उनसे संबद्ध सभी केंद्रीय कार्यालयों से जारी होने वाली चिट्ठियां क और ख वर्ग के राज्यों के लिए शत प्रतिशत तथा ग वर्ग के राज्यों के लिए 65 प्रतिशत हिन्दी में होनी चाहिए। इसी तरह फाइलों पर की जाने वाली 75 प्रतिशत टिप्पणियां हिन्दी में होनी चाहिए। नेशनल इनफॉर्मेटिक्स सेंटर (निक) ने उन्हें बताया कि किस तरह कंप्यूटर पर हिन्दी में बोल कर वॉयस टाइपिंग संभव है।

दो साल बाद 2016 में जब इन निर्देशों के क्रियान्वयन की समीक्षा की गई‚ तो बहुत ही निराशाजनक तथ्य सामने आया। रक्षा‚ विदेश‚ वाणिज्य एवं व्यापार‚ न्याय और बैंकिंग जैसे मंत्रालयों और विभागों की बात तो छोड़ ही दीजिए‚ पंचायती राज जैसे मंत्रालय से ग श्रेणी के राज्यों को कुल 1 प्रतिशत चिट्ठियां भी हिन्दी में नहीं भेजी गई थीं। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से सिर्फ 12 प्रतिशत और स्वास्थ्य मंत्रालय से सिर्फ 19 प्रतिशत चिट्ठियां हिन्दी में जारी की गई थीं। ये वो मंत्रालय हैं‚ जिनका काम जमीनी स्तर पर लोगों से जुड़ा हुआ है। जिस विभाग को राजभाषा के उन निर्देशों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी दी गई थी‚ उस विभाग के प्रमुख दो साल में पांच बार बदले गए। हर सचिव अपनी प्राथमिकता के साथ आया और अपनी प्राथमिकता के साथ विदा हो गया। निगरानी भी ठीक तरह से नहीं हो सकी।

अब आप 2019-20 के लिए राजभाषा क्रियान्वयन का वार्षिक कार्यक्रम देखिए। इसके अनुसार सभी केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों की वेबसाइट्स द्विभाषी होनी चाहिए। सभी कोड‚ मैनुअल‚ फार्म और रिपोर्ट शत प्रतिशत हिन्दी में उपलब्ध होनी चाहिए। क श्रेणी के राज्यों के बीच शत प्रतिशत पत्राचार हिन्दी में होने चाहिए। यहां तक कि ग श्रेणी के राज्यों की कम से कम 30 प्रतिशत‚ ख श्रेणी की 50 प्रतिशत और क श्रेणी की 75 प्रतिशत फाइल टिप्पणियां भी हिन्दी में होनी चाहिए। लेकिन व्यावहारिक स्तर पर इनकी जांच करें तो‚ पहले से आज की स्थिति में कोई ज्यादा बदलाव नजर नहीं आता। यदि आपको किसी मंत्रालय या विभाग की वेबसाइट हिन्दी में मिले‚ तो वहां राजभाषा के क्रियान्वयन के हासिल हुए लक्ष्य वाला भाग देखिए। वहां यह जानकारी मिलेगी कि इस साल इस संबंध में कितनी बैठकें हुईं‚ कितनी कार्यशालाएं आयोजित की गई‚ कितने प्रोत्साहन पुरस्कार दिए गए और कितने द्विभाषी कंप्यूटर खरीदे गए। लेकिन यह जानकारी नहीं मिलेगी कि कितना पत्राचार हिन्दी में हुआ‚ कितने सर्कुलर और रिपोर्ट मूल रूप से हिन्दी में लिखी गई और कितनी फाइलों पर टिप्पणियां राजभाषा के निर्देशों के अनुसार की गई। इसका जवाब तो दैनिक जीवन के अनुभवों से ही मिलेगा।

लोकतंत्र में सरकार का मतलब

लोकतंत्र में सरकार का मतलब सिर्फ चुनी हुई पार्टी के नेताओं से बना मंत्रिमंडल ही नहीं होता। उसमें सरकारी साहिबों-मुसाहिबों से बनी अफसरशाही भी होती है‚ जिसे चुनाव का कोई भय नहीं होता। इसलिए चुनी हुई सरकार की काबिलियत की पहचान सिर्फ इससे नहीं होती कि वह कितनी अच्छी या लोकप्रिय नीतियां बनाती है। उसकी उपलब्धियों की जांच इस बात से होती है कि इस शासकीय तंत्र से अपनी नीतियों पर किस तरह अमल करवाती है‚ कितना लक्ष्य हासिल करती है। मौजूदा सरकार भी वह लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई है‚ जिसका सपना लोगों ने 2014 में देखा था॥। राजभाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग के प्रभावी रूप से नहीं लागू होने के लिए हमेशा दक्षिणी राज्यों के विरोध को कारण के रूप में पेश किया जाता है। यह राजनीतिक स्टंट है। पिछले साल केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति का मसविदा ले कर आई। उसमें हिन्दी को अनिवार्य भाषा बनाया गया था। दक्षिण के राज्यों ने इसका विरोध किया। सरकार ने हिन्दी की अनिवार्यता का वह प्रावधान हटा दिया लेकिन इससे सरकारी कामकाज राजभाषा में करने की नीति किस हद तक बाधित होती हैॽ दक्षिण के वे राज्य पहले से ही ग श्रेणी में हैं। उन्हें तो यों भी सिर्फ 30 प्रतिशत फाइल टिप्पण हिन्दी में करने का लक्ष्यपाना है। लेकिन क श्रेणी के जिन हिन्दीभाषी राज्यों के साथ 100 प्रतिशत पत्र व्यवहार और 75 प्रतिशत फाइल टिप्पण हिन्दी में होना है‚ वहां यह लक्ष्य क्यों नहीं हासिल हो रहा हैॽ इसलिए दक्षिणी राज्यों के विरोध की चर्चा तो सिर्फ इधर के राज्यों में मिली असफलता को छुपाने का बहाना जैसा ही है। असली वजह इच्छाशक्ति की कमी है। हिन्दीवादी सरकार ने हिन्दी को सरकारी कामकाज की भाषा बनाने का वह संकल्प और प्रतिबद्धता नहीं दिखाई जिससे वह वांछित लक्ष्य हासिल कर पाती और इसका वह हिन्दी प्रेम लोकतंत्र की राजनीति में सिर्फ हिन्दी पट्टी तक पहुंचने वाली पुलिया बन कर रह गया।

हिंदी दिवस स्पीच | हिंदी दिवस पर भाषण | Hindi Diwas Speech In Hindi 2020

हिंदी दिवस स्पीच | हिंदी दिवस पर भाषण | Hindi Diwas Speech In Hindi 2020

राज्यों की नीतियों और उनके क्रियान्वयन में विसंगति होना कोई अचरज की बात नहीं। दुनिया भर की व्यवस्थाओं में इस बीमारी को पचाकर शक्तिशाली हो जाने का हुनर है। इतना ही नहीं व्यवस्थाएं तो इतनी लचीली होती हैं कि उनकी ही दो नीतियों में से एक उत्तर की ओर जाती है‚ तो दूसरे का संधान दक्षिण दिशा की ओर होता है। भारतीय संदर्भ में देखें तो राज्य की भाषायी नीति इसका शास्त्रीय उदाहरण है।आजादी के बाद से ही राज्य ने इस बात का नैतिक आवरण ओढ़ा कि वो भारतीय भाषाओं के जीवित बचे रहने की व्यवस्था करेगा लेकिन प्राणवायु का मुंह दूसरी ओर मोड़ दिया। तब से भारतीय भाषाएं इधर-उधर से कुछ ऑक्सीजन लेकर हांफती-उपसती अपना अस्तित्व बचाने में लगी हैं। हां‚ इतना जरूर है कि कुछ सरकारों में वाचिक स्तर पर यह भाषायी नीति पहले से थोड़ी उदार हो जाती है‚ तो कुछ में इतनी भी राहत की आवश्यकता नहीं समझी जाती।

वर्तमान में देखें तो भारत सरकार ने नये भारत की कल्पना करते हुए जिस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पेश किया है‚ उसमें भाषायी विविधता को अपनाने पर जोर दिया गया है‚ लेकिन ठीक इसी समय देश चलाने वाले प्रशासकों में यह भाषायी विविधता लगभग शून्य है। हमारे लगभग सभी प्रशासक गैर-भारतीय भाषाओं से चुन लिए गए हैं‚ और यही रीति भी रही है। यह ऐसा गंभीर विरोधाभास है‚ जिसे समय रहते ठीक नहीं किया गया तो फिर इसका दुष्परिणाम झेलना काफी भयावह होगा। एक बार फिर नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की ओर लौटते हैं। यह दस्तावेज इस बात को लेकर आश्वस्त है कि मातृ भाषा में शिक्षा ‘बेहतर शिक्षण' के लिए अनिवार्य है‚ इसलिए इस नीति को अधिक से अधिक बढ़ावा देना चाहिए। यह बात ठीक है और दुनियाभर के विद्वानों की इस बात पर सहमति रही है कि अपनी भाषा में पढ़ना और नये समय को गढ़ना एक सहज प्रक्रिया है।

भाषा और जीवित समाज

दरअसल‚ भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम भर नहीं होती‚ बल्कि उसमें एक जीवित समाज सांस ले रहा होता है। एक समाज की बेहतर समझ उस समाज की भाषा ही दे सकती है‚ अन्य कोई भी भाषा‚ चाहे वो कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो‚ उस समाज का अधूरा सच ही बता सकती है। यहीं से विरोधाभास का दूसरा सिरा खुलता है। राज्य की जिस इकाई पर समाज को समझ कर नीति बनाने और उसे लागू कराने की जिम्मेदारी होती है‚ वो भाषा के इस बुनियादी उपयोग से ही दूर है अर्थात भारत के सिविल सेवक‚ जिन पर नीति निर्माण और उसके क्रियान्वयन की बड़ी जिम्मेदारी है‚ में भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व नाममात्र है। क्या ऐसी प्रशासनिक संरचना के समाजोन्मुख होने की कल्पना की जा सकती हैॽ और वो ऐसा होने का दावा भी करे को क्या ऐसा करने में सक्षम हैॽ इसका उत्तर ‘ना' में देने पर शायद ही किसी को आश्चर्य हो!

दिलचस्प है कि सिविल सेवा में जिस नीति के कारण भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व लगातार कम होता चला गया‚ उसे इस व्यवस्था के हितचिंतकों ने ‘योग्यतम के चयन' का नाम दिया अर्थात चूंकि भारत को ‘श्रेष्ठ' प्रशासक चाहिए इसलिए चयन प्रणाली ऐसी हो जिसमें योग्यतम लोग ही चुने जाएं। अब योग्यता के दबी जा रही इस व्यवस्था से कौन पूछे कि आखिर‚ यह विशिष्ट खोज उसने की कहां से जो सिर्फ अंग्रेजी में ही प्रतिभा खोज पा रही है और भारतीय भाषाओं को नकारों के समूह मात्र के रूप में देख रहीॽ जब तमाम विद्वान और स्वयं सरकार का शिक्षा दस्तावेज मातृभाषा में आगे बढ़ने का ख्वाब देख रहे हैं‚ तब प्रशासकों की यह भर्ती प्रणाली उल्टी दिशा में क्यों चल रही हैॽ

योग्यता का पैमाना

दूसरी बात यह कि योग्यता कोई ऐसी विशिष्टता नहीं है‚ जो किसी खास भाषा में ही निवास करती है। हां‚ अगर किसी खास भाषा की जानकारी को ही योग्यता का पैमाना बना लिया जाए तब जरूर यह विशिष्ट नजर आने लगती है। सिविल सेवा के मामले में ऐसा ही हुआ है। यहां अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को ही योग्यता का अंतिम निर्धारक मान लिया गया है। इसलिए कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि योग्यता का यह दावा न केवल गलत‚ बल्कि अश्लील भी है। खासकर भाषायी विविधता वाले समाज से जुड़कर कार्य करने वाले अधिकारियों के लिए योग्यता का यह निर्धारक अश्लील ही है।

हमें यह बात समझनी होगी कि वही शासन व्यवस्था सबसे बेहतर कही जाएगी जिसमें पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व हो। खासकर एक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को इसका पालन जरूर करना चाहिए। इसका अभाव लोकतंत्र को कुलीनतंत्र में तब्दील कर देगा। वस्तुतः शासन व्यवस्था में लोक का भरोसा ही उसके बने रहने की गारंटी होता है किंतु निरंतर जानबूझकर एक बड़े वर्ग को नीचा दिखाया जाए और शासन में भागीदारी से वंचित किया जाए तो यह भरोसा कम होने लगता है। यह खतरनाक स्थिति है और इसे यथाशीघ्र बदल देना चाहिए। कई बार पुरानी व्यवस्था में लौटना संभव नहीं होता लेकिन गलत व्यवस्था को समाप्त कर नई न्यायपूर्ण व्यवस्था का निर्माण करना हमेशा हमारे हाथ में होता है। हम जितनी जल्दी शासन व्यवस्था में भारतीय भाषाओं का समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करेंगे हमारा लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा। लोहिया के हवाले से यह कि किसी भाषा का विरोध करना बुरा है पर उसके आधिपत्य को चुनौती देना कहीं से गलत नहीं है।

अंत में फिर नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के दर्शन पर लौटते हैं और सरकार के समक्ष विचार के लिए यह प्रश्न छोड़ देते हैं कि क्या भारतीय भाषाओं को दोयम मानने वाली प्रशासनिक व्यवस्था मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देगीॽ और अगर नहीं देगी तो फिर शिक्षा नीति किस प्रकार लागू होगीॽ भाषा को लेकर इस सरकार से एक उम्मीद बंधती है। शायद इस उम्मीद को सांस भी मिल जाए!

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English summary
Hindi Diwas Speech In Hindi 2020: Hindi day is celebrated every year on 14 September in India. Hindi is the fourth most spoken language in the world. Different languages ​​are spoken in India, but most of the Hindi language is spoken, written and read. Hindi Diwas was celebrated for the first time on 14 September 1953, this year we are celebrating 68th Hindi Diwas. Being a Hindi nation, India is called Hindustan. On Hindi Diwas people greet each other on the heart of Hindi Diwas. Speech competitions are organized on Hindi Diwas, speeches on Hindi Diwas and essay competition on Hindi Diwas are also organized in school college. In such a situation, if you also have to write a speech on Hindi Diwas or an essay on Hindi Diwas, then we have brought the best Hindi article for you. You can easily write a speech on Hindi Diwas by watching the draft of speech on Hindi Diwas. Let us know how to write speech on Hindi Diwas 2020, essay on Hindi Diwas 2020 and articles on Hindi Diwas 2020…
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