मांटेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार और भारत सरकार अधिनियम, 1919

2014 में यूपीएससी में पूछा गया सवाल : "मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार प्रस्तावों ने 'द्विशासन' प्रणाली लागू की, किन्तु इसने जिम्मेदारियों की रेखाओं को धुंधला कर दिया।"

 

जुलाई 1917 में चैम्बरलेन के स्थान पर एडविन एस. मोंटेग्यू को भारतीय मामलों का मंत्री (भारत-सचिव) बनाया गया। 20 अगस्त 1917 को हाउस ऑफ कॉमंस में उसने घोषणा की कि अब से भारत में ब्रिटिश नीति का संपूर्ण लक्ष्य स्वशासी संस्थाओं का क्रमशः विकास होगा ताकि ब्रिटिश साम्राज्य के अभिन्न अंग के रूप में भारत में क्रमशः उत्तरदायी सरकार की स्थापना हो सके। भारतीय नेताओं की उम्मीदें बढीं। 1918 के आरंभिक महीनों में ब्रिटेन और उसके मित्र राष्ट्रों की हालत खराब थी।

पश्चिमी मोर्चे पर जर्मनों के जोरदार आक्रमण की आशंका थी। तब अप्रैल महीने के अंत में वायसराय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड ने युद्ध में सहायता देने के प्रश्न पर विचार करने के लिए दिल्ली में भारतीय नेताओं का युद्ध सहायता परिषद का आयोजन किया। हालाकि गांधीजी अहिंसा के प्रति समर्पित थे, फिर भी इस सम्मेलन में भाग लेने दिल्ली गए। अबतक ब्रिटिश राज के प्रति उनके आस्था बनी हुई थी। परिषद् में सिर्फ़ इस बात पर चर्चा हुई कि इंगलैण्ड की सेना के लिए रंगरूटों की कैसे और कहां से भर्ती करनी है? इस सम्मेलन में गांधीजी ने अपने विचार हिंदी में रखे। पहली बार गोरी सरकार ने राष्ट्रीय भाषा को मान्यता दी। सारे देश को अच्छा लगा कि वायसराय के समक्ष कोई नेता हिंदी में बोलने का आग्रह रखता है।

 
मांटेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार और भारत सरकार अधिनियम, 1919

गांधीजी ने रंगरूट भरती करने के प्रस्ताव का, हिन्दी में एक ही वाक्य कह कर समर्थन कियाः "अपने दायित्व का पूरा ध्यान रख कर मैं प्रस्ताव का समर्थन करता हूं।" फिर तो वह तन-मन से रंगरूट-भर्ती के काम में लग गए। यूरोप के मोर्चे पर लड़ने वाली ब्रिटेन की भारतीय फौज के लिए गुजरात के गांवों में रंगरूट भर्ती करने के लिए जाना अहिंसा के पुजारी गांधीजी के लिए एक तरह से हास्यास्पद ही था। उनके इस प्रयास में तिलक का भी साथ मिला। तिलक और गांधीजी ने अंग्रेज़ों की सहायता के लिए धन और आदमी जुटाने का काम इस आशा से किया था कि इस निष्ठा के बदले सरकार बड़े राजनीतिक सुधार करेगी। तिलक ने कहा था, "युद्ध के ऋणपत्र खरीदो, पर उन्हें होमरूल के पट्टे समझो।" भारत ने लड़ाई में मदद देने के लिए नौ लाख पचासी हज़ार आदमी भेजे थे। भारतीयों को विश्वास था कि इंग्लैण्ड के प्रति अपनी इस वफादारी और सहयोग के बदले में उन्हें उचित मूल्य (साम्राज्य की भागीदारी में हिस्सा - होमरूल) मिलेगा।

भारतीयों का यह भ्रम भयानक रूप से टूटा। शान्ति के समझौते पर दस्तख़त हो जाने के बाद सरकार की तरफ से भारत को नए अधिकार देने की बात तो दूर रही, अब तक भारत वासियों के हाथ में जो थोड़े से अधिकार थे, वे भी छीन लिए गए। युद्ध के दौरान उपनिवेशों को अपने पक्ष में करने के लिए मित्र देशों की शक्तियों ने युद्ध के बाद लोकतंत्र और आत्मनिर्णय के युग का वादा किया था। लेकिन शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि साम्राज्यवादी शक्तियों का उपनिवेशों पर अपना नियंत्रण ढीला करने का कोई इरादा नहीं था। ब्रिटिश युद्ध के प्रयासों में भारत ने तन-मन-धन से सहयोग दिया। विभिन्न मोर्चों पर युद्ध में हजारों भारतीय मारे गए। जब युद्ध समाप्त हुआ, भारत के सभी वर्गों के लोगों को विभिन्न मोर्चों पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।

युद्ध के बाद, ब्रिटिश सरकार से राजनीतिक लाभ की काफी ऊंची उम्मीदें थीं। लेकिन युद्ध के प्रयास में भारतीयों के योगदान को ब्रिटिश द्वारा नज़रअन्दाज़ कर दिया गया। ब्रिटिश सरकार, भारतीयों के साथ अपनी शक्ति को छोड़ने या यहाँ तक कि साझा करने के लिए तैयार नहीं थी। युद्ध के बाद, भारत की परिस्थितियों और विदेशों से प्रभाव ने एक ऐसी स्थिति पैदा की जो विदेशी शासन के खिलाफ राष्ट्रीय विद्रोह के लिए तैयार थी। सरकार को लगा कि शासन में कुछ सुधार कर भारतीयों को बहला-फुसला लिया जाएगा। इसीलिए ब्रिटिश सरकार ने लॉर्ड मांटेग्यू और लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड के मातहत एक समिति का गठन किया, ताकि यह समिति भारत मे शासन में सुधार के उपाए सुझाए।

संवैधानिक सुधारों की घोषणा

1909 में हुए मॉर्ले-मिटों सुधारों ने भारतीयों को निराशा के अलावा कुछ नहीं दिया। बल्कि इसने हिन्दू-मुसलमानों के बीच की खाई को चौड़ा ही किया था। न तो इससे कांग्रेस ही खुश थी और न ही मुस्लिम लीग। विभिन्न मंचों पर संवैधानिक सुधारों की मांग जोर पकड़ती जा रही थी। सरकार ने 8 जुलाई, 1918 में संवैधानिक सुधारों की घोषणा की, जिसे मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार या मोंटफोर्ड सुधार के रूप में जाना जाता है।

भारतीय मामलों के मंत्री एडविन मोंटेग्यू और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड द्वारा प्रस्तावित होने के कारण इसे यह नाम दिया गया था। इसके तहत यह व्यवस्था की गयी थी कि प्रान्तों में आंशिक शासन होगा, जो चुनी गयी विधानसभा और भारतीय मंत्रियों के माध्यम से चलेगा, लेकिन महत्त्वपूर्ण विषय गवर्नर के लिए सुरक्षित रहेंगे जो मनोनीत एक्ज़ीक्यूटिव काउन्सिल की मदद से शासन करेंगे। केंद्र में सत्ता में कोइ हिस्सेदारी नहीं रहेगी। मोंटेग्यू ने इसे 'बड़ी छलांग' बताया था। लेकिन बाद में भारतीय मामलों के नए मंत्री एवं पूर्व वायासराय लॉर्ड कर्ज़न ने इसे 'अविवेकपूर्ण और प्रतिक्रियावादी' कहा था। भारतीय नेता इसके प्रति कोई मन नहीं बना पाए। मोंटफोर्ड सुधार के आधार पर भारत सरकार अधिनियम, 1919 बनाया गया।

इस समिति ने कुछ रियायतें देने का वादा किया था। 'उत्तरदायी सरकार' लाने की समस्याओं का समाधान के लिए 'द्विशासन' का एक अनोखा उपाय इस समिति ने सुझाया था, जिसके तहत प्रांतीय सरकारों के कुछ विभाग जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, स्थानीय निकाय मंत्रियों को सौंप दिए गए थे जो विधायिकाओं के प्रति उत्तरदायी थे, जबकि अन्य विषयों ओ 'आरक्षित' रखा गया था।

भारतीय प्रतिक्रिया

कांग्रेस ने मोंटफोर्ड सुधारों के प्रति अलोचनात्मक रवैया अपनाया। अगस्त 1918 में हसन इमाम की अध्यक्षता में बॉम्बे में एक विशेष सत्र में बैठक की और सुधारों को "निराशाजनक" और "असंतोषजनक" घोषित किया। कांग्रेस ने इस तरह की सुधारों के बजाय प्रभावी स्वशासन की मांग की। सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में कई वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता सरकारी प्रस्तावों को स्वीकार करने के पक्ष में थे। इस कारण नरमदलीय तत्व कांग्रेस से अलग होकर सप्रू, जयकर और चिंतामणि ने नेशनल लिबरल एसोसिएशन की स्थापना की थी। वहीं दूसरी ओर मोंटफोर्ड सुधारों को तिलक द्वारा "अयोग्य और निराशाजनक-एक धूप रहित सुबह" कहा गया था, यहां तक कि एनी बेसेंट ने उन्हें "इंग्लैंड की पेशकश और भारत को स्वीकार करने के लिए अयोग्य" पाया। मुस्लिम लीग के भी विचार कुछ ऐसे ही थे। गांधीजी ने कहा था, "मोंटफोर्ड सुधार... केवल भारत की संपत्ति को और कम करने और उसकी दासता को लंबा करने का एक तरीका था।"

1919 में कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन में इन रियायतों पर भी चर्चा हुई। हालांकि गांधीजी को ये सुधार पसंद तो नहीं थे, लेकिन अमृतसर कांग्रेस के समय उनका मानना था कि सरकार के प्रयास को सद्भाव से देखना चाहिए। अगर कांग्रेस इन सुधारों को मान लेती है, तो आगे की मांगों में सुविधा होगी। लोकमान्य तिलक और देशबंधु चितरंजन दास को यह सुधार ज़रा भी मान्य नहीं था। महामना निष्पक्ष थे। कांग्रेस दो पक्षों में बंट गई। गांधीजी इस मतभेद से क्षुब्ध थे। उन्हें लगा कि यदि वे अधिवेशन छोड़कर अहमदाबाद चलें जाएं तो कांग्रेस की दुविधा टल जाएगी। लेकिन अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू और मालवीयजी ने गांधीजी के चले जाने के प्रस्ताव को नामंज़ूर कर दिया। गांधीजी ने देशबंधु, लोकमान्य और जिन्ना से काफ़ी चर्चाएं की। कांग्रेस के इस अमृतसर अधिवेशन में चेम्सफोर्ड सुधारों के मत पर जिन्ना ने गांधीजी के रुख का समर्थ करते हुए अपने भाषण में उन्हें महात्मा गांधी' कहा था। जिन्ना के ही पहल पर चितरंजन दास आदि की आलोचनाओं के बावजूद कांग्रेस ने सुधारों पर अमल करने पर सहमति दी थी।

दिसंबर 1919 में ब्रिटिश संसद ने इस सुधारों को पास कर दिया। यह भारत सरकार अधिनियम, 1919 कहलाया, जिसे 1920 में लागू कर दिया गया।

मुख्य प्रावधान

इस अधिनियम द्वारा भारत को अंग्रेजी साम्राज्य का अभिन्न अंग मानते हुए केंद्र के साथ-साथ प्रांतीय स्तरों पर शासन में सुधारों की शुरुआत की गयी। इस सुधार का एकमात्र उद्देश्य भारतीयों का शासन में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था। सरकार का दावा था कि उस अधिनियम की विशेषता 'उत्तरदायी शासन की प्रगति' है।

केंद्र सरकार-कोई ज़िम्मेदारी नहीं

अखिल भारतीय स्तर पर सरकार के लिए अधिनियम में किसी उत्तरदायी सरकार की परिकल्पना नहीं की गई थी। यहाँ ऐसे मामले जो राष्ट्रीय महत्त्व के थे या एक से अधिक प्रांतों से संबंधित थे, केंद्र स्तरीय सरकार द्वारा शासित थे, जैसे: विदेश मामले, रक्षा, राजनीतिक संबंध, सार्वजनिक ऋण, नागरिक और आपराधिक कानून, संचार सेवाएं आदि को शामिल किया गया था। इण्डिया कॉन्सिल में तीन भारतीय सदस्यों को शामिल किया गया, जिनका कार्य भारत मंत्री को परामर्श देना था।

वायसराय की कार्यकारिणी

इस अधिनियम ने वायसराय को मुख्य कार्यकारी प्राधिकारी बनाया। प्रशासन के लिए दो सूचियाँ होनी थीं- केंद्रीय और प्रांतीय। वायसराय की आठ सदस्यीय कार्यकारी परिषद में तीन भारतीय थे। वायसराय ने प्रांतों में आरक्षित विषयों पर पूर्ण नियंत्रण बनाए रखा। उसे अनुदानों में कटौती करने का अधिकार था, केंद्रीय विधायिका द्वारा खारिज किए गए बिलों को प्रमाणित कर सकता था और अध्यादेश जारी कर सकता था।

विषयों की सूची

इस अधिनियम ने प्रांतीय सरकार के स्तर पर कार्यपालिका के लिए द्वैध शासन की शुरुआत की। केन्द्रीय और प्रांतीय विषय अलग कर दिए गए। रक्षा, राजनीतिक संबंध, डाक-तार, संचार, क़ानून और प्रशासन जैसे महत्त्वपूर्ण विषय केन्द्रीय सूची में शामिल किए गए थे। प्रांतीय सूची में सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, सामान्य प्रशासन, चिकित्सा सुविधाएं, भूमि-राजस्व, जल आपूर्ति, अकाल राहत, कानून और व्यवस्था, कृषि आदि।

केन्द्रीय व्यवस्थापिका

एक द्विसदनीय विधानमंडल की व्यवस्था पेश की गई थी, जिसमें उच्च सदन या राज्य परिषद (Upper House or Council of State) और निम्न सदन या केंद्रीय विधानसभा ( Lower House or Central Legislative Assembly) शामिल थी।

उच्च सदन

उच्च सदन या राज्य परिषद में 60 सदस्य थे, जिनमें से 26 वायसराय द्वारा मनोनीत सदस्य थे और 34 निर्वाचित सदस्य। निर्वाचित सदस्यों में से 20 जनरल, 10 मुस्लिम, 3 यूरोपीय और 1 सिख सदस्य का निर्वाचन होना था। इसका कार्यकाल 5 वर्ष का था और इसमें केवल पुरुष सदस्य थे।

निम्न सदन

निचले सदन या केंद्रीय विधान सभा में 145 सदस्य थे। इनमें से 104 निर्वाचित सदस्यों में से 52 सामान्य, 30 मुस्लिम, 2 सिख, 20 विशेष वर्गों (यूरोपियन, ज़मींदार, व्यापारिक संगठन) के लिए आरक्षित थे। 41 मनोनीत सदस्यों में से 26 आधिकारिक और 15 गैर-सरकारी सदस्य थे। केंद्रीय विधान सभा का कार्यकाल 3 वर्ष था।

नए सुधारों के तहत अब विधायक प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछ सकते थे, स्थगन प्रस्ताव पारित कर सकते थे और बजट के एक हिस्से पर मतदान कर सकते थे, लेकिन बजट का 75 प्रतिशत हिस्से पर अभी भी मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं था। कुछ भारतीयों ने वित्त सहित महत्वपूर्ण समितियों में अपना रास्ता खोज लिया। गृह सरकार (ब्रिटेन में) के मोर्चे पर, भारत सरकार अधिनियम, 1919 ने एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया - भारत के राज्य सचिव को अब से ब्रिटिश राजकोष से भुगतान किया जाना था। विधायिका का वायसराय और उसकी कार्यकारी परिषद पर कोई नियंत्रण नहीं था।

वायसराय को विधायिका को संबोधित करने का अधिकार था। उसे बैठकों को बुलाने, स्थगित करने या विधानमंडल को निरस्त या खंडित करने का अधिकार प्राप्त था। वह विधायिका के 3 साल के कार्यकाल को बढ़ा सकता था।

केंद्र सरकार को प्रांतीय सरकारों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त था। केंद्रीय विधायिका को पूरे भारत के लिये, अधिकारियों और आमजन हेतु कानून बनाने के लिये अधिकृत किया गया था, चाहे वे भारत में हों या नहीं।

विधायिका को किसी विधेयक को पेश करने के लिए वायसराय की अनुमति हासिल करना ज़रूरी था। भारतीय विधायिका भारत के संबंध में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किसी भी कानून को बदल या उलट नहीं सकती थी।

प्रांतीय सरकार-द्वैध शासन की शुरुआत

इस अधिनियम ने प्रांतीय सरकार के स्तर पर कार्यपालिका के लिए द्वैध शासन की शुरुआत की। इसमें वे मामले शामिल किए गए थे जो उस प्रांत से संबंधित थे, जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्थानीय स्वशासन, शिक्षा, सामान्य प्रशासन, चिकित्सा सुविधाएं, भूमि-राजस्व, जल आपूर्ति, अकाल राहत, कानून और व्यवस्था, कृषि आदि।

कार्यपालिका

प्रांतीय स्तर पर कार्यपालिका हेतु द्वैध शासन, यानी, दो-कार्यकारी पार्षदों और लोकप्रिय मंत्रियों का शासन शुरू किया गया था। गवर्नर प्रांत का कार्यकारी प्रमुख था। विषयों को दो सूचियों में विभाजित किया गया था: 'आरक्षित' जिसमें कानून और व्यवस्था, वित्त, भूमि राजस्व, सिंचाई, आदि जैसे विषय शामिल थे, और शिक्षा, स्वास्थ्य, स्थानीय सरकार, उद्योग, कृषि, उत्पाद शुल्क, आदि जैसे 'स्थानांतरित' विषय शामिल थे। आरक्षित विषयों को गवर्नर द्वारा नौकरशाहों की कार्यकारी परिषद के माध्यम से प्रशासित किया जाता था, और स्थानांतरित विषयों को विधान परिषद के निर्वाचित सदस्यों में से नामित मंत्रियों द्वारा प्रशासित किया जाता था। मंत्रियों को विधायिका के प्रति जिम्मेदार होना था और यदि विधायिका द्वारा उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित किया जाता, तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ता, जबकि कार्यकारी पार्षद विधायिका के प्रति जिम्मेदार नहीं थे। प्रांत में संवैधानिक तंत्र के विफल होने की स्थिति में गवर्नर हस्तांतरित विषयों का प्रशासन भी अपने हाथ में ले सकता था। भारत के राज्य सचिव और गवर्नर जनरल आरक्षित विषयों के संबंध में हस्तक्षेप कर सकते थे, जबकि स्थानांतरित विषयों के संबंध में, उनके हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित थी। द्वैध शासन (Diarchy) को आठ प्रांतों में लागू किया गया था जिसमें असम, बंगाल, बिहार और उड़ीसा, मध्य प्रांत, संयुक्त प्रांत, बॉम्बे, मद्रास और पंजाब प्रांत शामिल थे।

विधान - सभा

प्रांतीय विधान परिषदों का और विस्तार किया गया और 70 प्रतिशत सदस्यों का चुनाव किया गया। सभी प्रान्तों में सदस्यों की संख्या सामान नहीं थी। सांप्रदायिक और वर्गीय मतदाताओं की व्यवस्था को और मजबूत किया गया। महिलाओं को भी वोट देने का अधिकार दिया गया। विधान परिषदें कानून शुरू कर सकती थीं लेकिन गवर्नर की सहमति आवश्यक थी। गवर्नर विधेयकों को वीटो कर सकता था और अध्यादेश जारी कर सकता था। विधान परिषद बजट को अस्वीकार कर सकती थी लेकिन यदि आवश्यक हो तो गवर्नर इसे बहाल कर सकता था। गवर्नर मंत्रियों को किसी भी आधार पर बर्खास्त कर सकता था। विधायकों को बोलने की आजादी थी।

सुधारों से लाभ

इस अधिनियम के लागू हो जाने से भारतीयों को प्रशासन के बारे में सूचना मिली और वे अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हुए। भारतीयों में राष्ट्रवाद और जागृति की भावना पैदा हुई और यह स्वराज के लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण क़दम साबित हुआ। चुनाव क्षेत्रों का विस्तार हुआ जिससे लोगों में मतदान के महत्त्व के प्रति समझ बढ़ी। भारत में प्रांतीय स्वशासन की शुरुआत हुई। लोगों को प्रशासन करने का अधिकार मिला जिससे सरकार पर प्रशासनिक दबाव बहुत कम हो गया। भारतीयों को प्रांतीय प्रशासन में ज़िम्मेदारियों का निर्वहन करने हेतु तैयार किया।

कमियां

अधिनियम में अखिल भारतीय स्तर पर किसी भी ज़िम्मेदार सरकार की परिकल्पना नहीं की गई। मताधिकार बहुत सीमित था। एक अनुमान के अनुसार, केंद्रीय विधायिका के लिए मतदाताओं की संख्या लगभग पंद्रह लाख तक बढ़ा दी गई थी, जबकि भारत की जनसंख्या लगभग 26 करोड़ थी। त्रुटिपूर्ण चुनावी प्रणाली और सीमित मताधिकार के कारण ये सुधार लोकप्रियता नहीं हासिल कर सके। इसके अलावे एक अलग चुनावी प्रणाली ने सांप्रदायिकता की भावना को बढ़ावा दिया। केंद्र में, वायसराय और उसकी कार्यकारी परिषद पर विधायिका का कोई नियंत्रण नहीं था।

इससे दोनों के बीच लगातार टकराव की स्थिति बनी रहती थी । केंद्र में विषयों का विभाजन संतोषजनक नहीं था। प्रांतों को केंद्रीय विधायिका के लिए सीटों का आवंटन प्रांतों के 'महत्व' पर आधारित था - उदाहरण के लिए, पंजाब का सैन्य महत्व और बॉम्बे का व्यावसायिक महत्व। प्रांतों के स्तर पर, विषयों का विभाजन और दो भागों का समानांतर प्रशासन तर्कहीन था और इसलिए अव्यवहारिक था। सिंचाई, वित्त, पुलिस, प्रेस और न्याय जैसे विषय 'आरक्षित' थे। प्रांतीय मंत्रियों का वित्त और नौकरशाहों पर कोई नियंत्रण नहीं था। महत्वपूर्ण मामलों पर भी अक्सर मंत्रियों से सलाह नहीं ली जाती थी; वास्तव में, उन्हें राज्यपाल द्वारा किसी भी मामले पर खारिज किया जा सकता था जिसे बाद वाला विशेष मानता था। गवर्नर को अप्रतिबंधित शक्तियाँ प्राप्त थीं, वह अपनी परिषद और मंत्रियों के निर्णय के विरुद्ध भी निर्णय ले सकता था प्रशासन से संबंधित लगभग सभी महत्त्वपूर्ण मामले राज्यपाल पर निर्भर थे। मंत्रियों को उत्तरदायित्व तो सौंपा गया था लेकिन गवर्नर को इतने विस्तृत अधिकार मिले थे कि मंत्री नाममात्र के मंत्री थे।

परिणाम और उपसंहार

उदार साम्राज्यवादी इतिहासकार मोंटफोर्ड सुधारों को लेकर काफी उत्साहित दिखते हैं। वे मानते हैं कि ये सुधार मूलत: अंग्रेजों की नेकनीयती के प्रमाण हैं। उन विचारकों द्वारा मांटेग्यू को सुधार के लिए जेहाद करनेवाले के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह घोषणा पुरानी ब्रिटिश नीति से अलग थी। भारत के सांविधानिक विकास के इतिहास में इन सुधारों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह प्रतिनिधि सरकार की बात करती थी। हालाकि मताधिकार सीमित था फिर भी इस व्यवस्था से देश के मतदाताओं में मत देने की व्यावहारिक समझ विकसित हुई। इस अधिनियम द्वारा भारत में प्रांतीय स्वशासन तथा आंशिक रूप से उत्तरदायी शासन की व्यवस्था की गई। केंद्र में जहाँ द्विसदनीय व्यवस्थापिका की व्यवस्था हुई, वहीं केंद्र की कार्यकारी परिषद में भारतीयों को पहले से तिगुना प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान था।

इन तथ्यों के बावजूद यह स्पष्ट है कि सुधारों की वास्तविक योजना राष्ट्रवादियों की मांगों की तुलना में अत्यंत नगण्य थी। कैंब्रिज इतिहासकारों का यह मानना कि 1919 के एक्ट से निर्वाचक मंडलों की संख्या में विस्तार हुआ और राजनिज्ञों को अधिक जनतांत्रिक शैली अपनाने के लिए बाध्य होना पडा, अपूर्ण है। सुधार की प्रक्रिया की सूक्ष्मता से जांच करने पर पता चलता है कि इसमें नया कुछ भी नहीं था। इस अधिनियम में इतनी कमियाँ थी कि इससे भारतीयों को घोर निराशा हुई। यह भारतीयों की आकांक्षाओं को धूल-धूसरित कर रहा था। पी.ई. रॉबर्ट्स ने अपन मत रखते हुए कहा था, "दोहरी कार्यपालिका का द्वैध शासन लगभग हर सैद्धांतिक आपत्ति के लिए खुला था।" इस द्वितन्त्रीय सरकार का मतलब था - राज्यों में एक तरह का दुहरा शासन। यह अधिनियम भारतीयों की स्वशासन की मांग को पूरी तरह से अस्वीकार कर रहा था। अधिनियम ने भारतीयों और अंग्रेज़ों दोनों में सत्ता के लिये संघर्ष को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में सांप्रदायिक दंगे हुए जो वर्ष 1922 से 1927 तक जारी रहे। 30 सदस्यों का चुनाव पृथक मुसलमान निर्वाचन मंडल के द्वारा चुना जाता था, जो केवल मुसलमान होंगे। सिखों को भी सांप्रदायिक राजनीति के अंतर्गत विशेषाधिकार प्रदान किए गए। सिखों को भी पृथक निर्वाचन मंडल में शामिल किया गया। मुसलमान और सिखों को जनसंख्या के आधार पर नहीं बल्कि उनके राजनीतिक महत्व के आधार पर प्रांतीय विधान मंडलों में स्थान प्रदान किया गया।

वर्ष 1923 में स्वराज पार्टी की स्थापना हुई तथा उसने चुनावों में मद्रास को छोड़कर पर्याप्त संख्या में सीटें जीती। जबकि पार्टी बंबई और मध्य प्रांतों में मंत्रियों के वेतन के साथ अन्य वस्तुओं की आपूर्ति को अवरुद्ध करने में सफल रही। इस प्रकार दोनों प्रांतों के गवर्नरों को द्वैध शासन को समाप्त करने हेतु मजबूर होना पड़ा और स्थानांतरित विषयों को अपने नियंत्रण में ले लिया गया। प्रांतीय स्तर पर प्रशासन का दो स्वतंत्र भागों में बँटवारा राजनीति के सिद्धांत व व्यवहार के विरूद्ध था। उस समय मद्रास के मंत्री रहे के.वी.रेड्डी ने व्यंग्य भी किया था- 'मैं सिंचाई मंत्री था किंतु मेरे अधीन सिंचाई विभाग नहीं था।'

इस अधिनियम का एक महत्त्वपूर्ण दोष यह भी था कि इसमें प्रांतीय मंत्रियों का वित्त और नौकरशाही पर कोई नियंत्रण नहीं था। नौकरशाही मंत्रियों की अवहेलना तो करती ही थी, कई महत्त्वपूर्ण विषयों पर मंत्रियों से मंत्रणा भी नहीं की जाती थी। उपर्युक्त विवेचना के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचाते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को राजनीतिक शक्ति देने का प्रस्ताव तो मात्र एक बहाना बनाया था, वास्तविक शक्ति तो अभी भी अंग्रेजों के ही हाथों में ही थी। मोतीलाल नेहरू ने ठीक ही कहा था, 'ऐसा लगता है जैसे जो कुछ एक हाथ से दिया गया उसे दूसरे हाथ से ले लिया गया।'

लॉर्ड कर्जन ने टिपण्णी की थी, "जब मंत्रिमंडल ने 'परम स्वशासन' की अभिव्यक्ति का प्रयोग किया तो उन्होंने संभवतः 500 वर्षों की एक मध्यवर्ती अवधि पर विचार किया।" इन सुधारों के साथ 'द्विशासन' प्रणाली लागू तो हो गई लेकिन वास्तविक प्रशासनिक शक्तियां वायसराय के हाथों में ही केंद्रित थी। शिक्षा और सफाई जैसे कम महत्त्व वाले विभागों की ज़िम्मेदारी प्रांतीय विधान सभाओं द्वारा निर्वाचित सदस्यों में से चुने गए मंत्रियों को सौंपी गई थी, जबकि वित्त, पुलिस और सामान्य प्रशासन जैसे महत्त्वपूर्ण विभाग कार्यकारी परिषद् के सदस्यों के लिए आरक्षित कर दिए गए थे। स्थानीय व्यय को स्थानीय रूप से अर्जित और प्रबंधित राजस्व से ही चलाने का उत्तरदायित्व था।

वायसराय भारत सचिव के माध्यम से ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी होता था, भारतीय जनता के प्रति नहीं। वायसराय की कार्यकरिणी परिषद में तीन भारतीय सदस्यों की नियुक्ति का प्रावधान रखा गया था, परंतु भारत के सदस्यों को प्रशासन के कम महत्वपूर्ण विभाग दिए गए। भारत के सदस्य वायसराय के प्रति उत्तरदायी थे तथा वायसराय भारत सचिव के माध्यम से ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी था। इसका मतलब यह था कि महत्त्वपूर्ण विभागों का नियंत्रण उन नौकरशाहों के हाथ में था, जो ब्रितानी सरकार और उसकी संसद के प्रति ज़िम्मेदार थे। केन्द्रीय सरकार का चरित्र पहले जैसा बना रहा। वह पहले की तरह संसद के प्रति ज़िम्मेदार रही।

विधान मंडल का, वायसराय और उसकी कार्यकारी परिषद् पर, न कोई नियंत्रण था, न ही उनके बारे में बोलने का अधिकार। केन्द्रीय सरकार को प्रान्तों पर नियंत्रण रखने के सभी अधिकार प्राप्त थे। सुमित सरकार कहते हैं, "बड़ी चालाकी से भारतीय राजनीतिज्ञों को संरक्षण की चूहा-दौड़ में डाल दिया गया था जिससे संभवत: उनकी विश्वसनीयता कम होती थी।" इन सुधारों के संबंध में काफी विवाद रहा है कि इनमें लन्दन (भारत सचिव) का योगदान अधिक था या दिल्ली (वायसराय) का। इसलिए यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगी कि "मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार प्रस्तावों ने 'द्विशासन' प्रणाली लागू की, किन्तु इसने जिम्मेदारियों की रेखाओं को धुंधला कर दिया।"

For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS  
For Daily Alerts

English summary
Read all about the Montague-Chelsford reforms and Indian Government Act 1919 during the British period. This will be helpful in your History subject for UPSC and other competitive exams.
--Or--
Select a Field of Study
Select a Course
Select UPSC Exam
Select IBPS Exam
Select Entrance Exam
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X