Independence Day 2022: कुशाल कोंवर के जीवन से जुड़ी 10 बड़ी बातें

कुशाल कोंवर एक असमिया स्वतंत्रता सेनानी, एक सच्चे देशभक्त और अहिंसा के गांधीवादी दर्शन के अनुयायी थे। वह भारत में एकमात्र शहीद थे जिन्हें 1942-43 के भारत छोड़ो आंदोलन के अंतिम चरण के दौरान फांसी दी गई थी। अंग्रेजों ने कुशल कोंवर को जोरहाट जेल में 15 जून 1943 को सुबह 4.30 बजे फांसी दी थी।

आइए आज के इस आर्टिकल में हम आपको कुशाल कोंवर के जीवन से जुड़ी 10 प्रमुख बातों के बारे में बताते हैं कि उनका जीवन कैसा था, एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्होंने देश के लिए क्या योगदान दिए।

कुशाल कोंवर के जीवन से जुड़ी 10 बड़ी बातें

कुशाल कोंवर के जीवन से जुड़ी 10 बड़ी बातें

1. कुशाल कोंवर का जन्म 21 मार्च, 1905 को असम के गोलाघाट जिले के सरुपथर के पास बलिजन चरियाली में हुआ था। उनके पिता का नाम सोनाराम कोंवर और माता का नाम कोंपाही था।

2. कुशल कोंवर ने अपनी स्कूली शिक्षा बालीगांव स्कूल से शुरू की। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने गोलाघाट के बेजबरुआ इंग्लिश स्कूल में दाखिला लिया। उस समय पूरे भारत में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ जिसमें की कुशाल कोंवर भी शामिल हो गए।

3. 1925 में, कुशल कोंवर ने बेंगमाई में अपना खुद का एक स्कूल शुरू किया। लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उन्हें इसे छोड़ना पड़ा। जिसके बाद में नौकरी करने लगे लेकिन अंदर के देशभक्त ने उन्हें नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। और 1936 में उन्होंने खुद को पूरी तरह से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में समर्पित कर दिया।

4. 1942 में, भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ और 'करो या मरो' देशभक्तों का आदर्श वाक्य बन गया। हालांकि महात्मा गांधी ने अहिंसा के दर्शन की वकालत की, लेकिन कई देशभक्तों ने सशस्त्र और विध्वंसक तकनीकों को अपनाया तो, अगस्त क्रांति शुरू हुई।

5. असम में, कांग्रेस के 'शांति सेना' (शांति बल) और 'मृत्यु वाहिनी' (मृत्यु दस्ते) आंदोलन में कुशल कोंवर ने सक्रिय भाग लिया।

6. 10 अक्टूबर 1942 को 1.42 बजे सरूपथर मृत्यु वाहिनी के कुछ सदस्यों ने सरूपथर के पास एक सैन्य ट्रेन को पटरी से उतार दिया। ट्रेन में ब्रिटिश और अमेरिकी सैनिक सवार थे। सरुपथर के पटरी से उतरने में काफी संख्या में सैनिक मारे गए।

7. जिसके बाद 13 अक्टूबर को ब्रिटिस सेना ने कई लोगों को गिरफ्तार किया जिसमें से एक कुशल कोंवर थे।

8. 6 मार्च 1943 को सिबसागर जिले के उपायुक्त सी.ए. हम्फ्री की अदालत में कुशाल कोंवर की सुनवाई शुरू हुई। कई अधिवक्ताओं ने कुशल कोंवर का बचाव किया। साथ ही उसके खिलाफ कोई सबूत नहीं था। लेकिन सरूपथर शांति वाहिनी का एक पुलिन बरुआ मामले में गवाह बन गया।

9. जिसके बाद मॉक ट्रायल में जज सी ए हम्फ्री ने कुशल कोंवर समेत चार लोगों को फांसी की सजा सुनाई। हालांकि निर्दोष, कुशल कोंवर ने अवैध या गैरकानूनी सजा को स्वीकार कर लिया। कुशाल कोंवर को छोड़कर, अन्य तीन ने दया याचिका के कारण उनकी सजा को 10 साल के कठोर कारावास में बदल दिया।

10. कुशल कोंवर को जोरहाट जेल में 15 जून 1943 को फांसी दी थी। फांसी से पहले कुशल कोंवर ने गीता के कुछ चुनिंदा श्लोक पढ़े और भगवान से प्रार्थना की। कुशल कोंवर न तो असाधारण रूप से लोकप्रिय नेता थे और न ही क्रांतिकारी। लेकिन वह एक 'सच्चे देशभक्त' थे जिसके लिए उन्होंने खुशी-खुशी अपना जीवन बलिदान कर दिया।

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English summary
Kushal Konwar was an Assamese freedom fighter, a true patriot and a follower of Gandhian philosophy of non-violence. He was the only martyr in India who was hanged during the last phase of the Quit India Movement of 1942-43. Kushal Konwar was born on March 21, 1905 at Balijan Chariali near Sarupathar in Golaghat district of Assam. His father's name was Sonaram Konwar and mother's name was Konpahi.
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