Solar Eclipse 2023: भारत में सूर्य ग्रहण कई अलग-अलग मान्यताओं और धारणाओं के साथ जुड़ा हुआ है। जहां एक तरफ इसका संबंध धार्मिक आस्थाओं के साथ है, तो वहीं दूसरी तरफ इसकी वैज्ञानिक मान्याएं भी हैं। सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण दो विस्मयकारी घटनाएं है, जिसे देखने का सौभाग्य हमें प्राप्त होता है। ये सच है कि दुनिया भर की प्राचीन सभ्यताओं इससे डरती भी हैं। सांस्कृतिक/धार्मिक अवधारणों के अनुसार सूर्य ग्रहण के कुछ सकारात्मक प्रभाव होते हैं तो कुछ के लिए नकारात्मक प्रभाव। खैर यहां इस लेख में हम आपका ध्यान इससे जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों आदि की तरफ खींचना चाहेंगे।
धार्मिक आस्थाओं और प्रथाओं की बातों से हटकर अलग जाएं तो आर्यभट्ट की इस भूमि पर लोगों को इन बातों को छोड़ इस विस्मयकारी घटना में हिस्सा लेना चाहिए और इसके बारे में अधिक से अधिक जानना चाहिए। इस साल यानी 2023 में कुल 4 ग्रहण होंगे। 2 सूर्य ग्रहण और 2 चंद्र ग्रहण। जिसमें से पहले सूर्य ग्रहण का आप और हम सभी हिस्सा बनने वाले हैं। इस साल का पहला सूर्य ग्रहण 20 अप्रैल 2023 को देखने को मिलेगा और ये पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा।

सूर्य ग्रहण से जुड़ी आस्था और विज्ञान
दुनिया भर में प्राचीन संस्कृतियों का मानना है कि सूर्य का अचानक काला हो जाना देवताओं की नाराजगी को दर्शाता है। धार्मिक मान्यताओं और कथाओं के अनुसार, सूर्य पर ग्रहण लोगों पर बुरा प्रभाव डालता है। इसे कई रूपों में अच्छा नहीं माना जाता है। वहीं भारत में ज्योतिषशास्त्र में ग्रहण को विशेष माना जाता है। इतना ही नहीं धार्मिक दृष्टिकोण की बात करें तो ग्रहण को अशुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इस दौरान कुछ खाना-पीना नहीं चाहिए और ग्रहण पूरा होने के बाद स्नान करके दान करना चाहिए। सूर्य ग्रहण के समय मंदिर के कपाट भी बंद कर दिए जाते हैं।
वैज्ञानिक कारण की बात करें तो सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य के बीच आता है। जिससे चंद्रमा सूर्य का दृश्य पूरी तरह या फिर कुछ आंशिक रूप से ढक देता है, जिसकी वजह से हमें आंशिक या पूर्ण सूर्य ग्रहण देखने को मिलता है। सूर्य ग्रहण में भी कई तरह के सूर्य ग्रहण होते हैं। जिसकी जानकारी लेख में नीचे विस्तृत रूप से दी गई है।
क्या है सूर्य ग्रहण
सूर्य ग्रहण तब होता है जब सूर्य और पृथ्वी के बीच से चंद्रमा गुजरता है। इस दौरान चंद्रमा से सूर्य का दृश्य ढक जाता है। जिसकी वजह से हमें आंशिक और पूर्ण सूर्य ग्रहण देखने को मिलता है। सूर्य ग्रहण चंद्रमा और पृथ्वी की दूरी पर भी निर्भर करता है। ये संरेखण लगभग 6 महीने में होता है। इस दौरान चंद्रमा का कक्षीय तल पृथ्वी की कक्षा समतल के सबसे करीब होता है। जिस कारण से सूर्य की डिस्क को चंद्रमा कवर करता है और हमें सूर्य ग्रहण देखने को मिलता है। आइए जानते हैं सूर्य ग्रहण कितने प्रकार के होता हैं-
पूर्ण सूर्यग्रहण
पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान, आकाश पूरी तरह से काला हो जाता है। इस दौरान दिन रात जैसा प्रतीत होता है। पूर्ण ग्रहण तब होता है जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में आते हैं। इस दौरान चंद्रमा पृथ्वी के सबसे करीब होता है। जिस कारण वह सूर्य को ढक देता है।
आंशिक सूर्य ग्रहण
आंशिक सूर्य ग्रहण तब होता है तब देखने को मिलता है जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी पूर्ण रूप से एक सीध में नहीं होते हैं। इसमें सूर्य की सतह के केवल एक छोटे से भाग पर ही काली छाया दिखाई देती है। जिसमें सूर्य पूरी तरह से नहीं छुपता और आंशिक रूप में दिखाई देता है।
कुंडलाकार सूर्य ग्रहण
कुंडलाकार या वलयाकार ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी से सबसे दूर होता है और इसी कारण छोटा दिखाई देता है। वलयाकार ग्रहण के दौरान चंद्रमा सूर्य के सामने होता है और सूरज के रंग की एक बड़ी डिस्क के ऊपर एक गहरे रंग की डिस्क जैसा दिखता है। जिसे आसान भाषा में हम फायर रिंग (Fire Ring) भी कहा जाता है। यह चंद्रमा के चारों ओर एक वलय जैसा दिखता है। सूर्य ग्रहण की ये आवृत्ति हर 18 महीने में एक बार होती है और केवल कुछ मिनटों तक रहती है। ये सबसे दुर्लभ माना जाता है।
कैसे देखें सूर्य ग्रहण
कहा जाता है कि सूर्य ग्रहण को सीधा आकाश में नग्न आंखों से नहीं देखना चाहिए। इसका मुख्य कारण ये है कि ये आपकी आंखों को स्थायी रूप से हानि पहुंचा सकता है। ये किसी एक प्रकार के सूर्य ग्रहण को देखने के लिए नहीं है, बल्कि हर प्रकार के सूर्य ग्रहण को नग्न आंखों से नहीं देखना चाहिए। सूर्य ग्रहण को देखने के लिए आपको उचित सुरक्षा उपकरणों का उपयोग करना चाहिए। लोग अधिकतर इसे काले चश्में से या पानी में इसकी परछाई को देखते हैं।
सूर्य ग्रहण से जुड़े रोचक तथ्य
• सूर्य ग्रहण केवल अमावस्या के दौरान होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ग्रहण होने के लिए चंद्रमा का सूर्य और पृथ्वी के बीच होना आवश्यक है।
• ग्रहण के कुल योग उनकी लंबाई में भिन्न होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि पृथ्वी हमेशा सूर्य से समान दूरी पर नहीं होती है। जिस कारण अलग-अलग तरह के सूर्य ग्रहण देखने को मिलते हैं।
• चीन को सूर्य ग्रहणों की अब तक की पहली रिकॉर्डिंग के लिए जाना जाता है। इन रिकॉर्डिंग की हड्डी के टुकड़ों पर प्रशंसा की गई और इन्हें 'ओरेकल बोन' कहा गया। ये लगभग 1050 ईसा पूर्व का है।
• प्रागैतिहासिक काल में, लोगों का मानना था कि ग्रहण देवताओं की ओर से एक चेतावनी है और उन्हें उनके द्वारा किए गए दुष कर्मों के लिए दंडित किया जाएगा।
• ग्रीक भाषा में 'एक्लिप्स' शब्द का अर्थ पतन होता है।
• कनाडा के खगोलशास्त्री जे.डब्ल्यू. कैंपबेल ने 12 अलग-अलग तरह के ग्रहणों को देखने के अपने प्रयासों में 50 वर्षों तक पूरी दुनिया की यात्रा की। दुर्भाग्य से, हर बार वह बादलों से घिरे आसमान ही देख पाएं।
• चीनी भाषा में, सूर्य ग्रहण को 'शिह' कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'खाना'। प्राचीन काल में चीन में लोग 'स्वर्गीय कुत्ते' को डराने के प्रयास में ढोल पीटते थे, जिसको लेकर उनकी मान्यता थी कि वह सूर्य को खा रहा है।
• अमेरिका में 21 अगस्त 2017 को हुआ सूर्य ग्रहण 38 वर्षों में यहां होने वाला पहला पूर्ण ग्रहण था और इसे द ग्रेट अमेरिकन एक्लिप्स का उपनाम दिया गया था। इससे पहले हुआ सूर्य ग्रहण 26 फरवरी, 1979 को हुआ था।
क्या है ग्रहण का साहित्यिक संदर्भ
- ग्रहण का सबसे पहला साहित्यिक संदर्भ हमें ऋग्वेद की पुस्तक में प्राप्त होता है। ऋग्वेद V पद्य 40 में लगभग 1400 ईसा पूर्व में भारत की सबसे पुरानी लिखित अभिलेख में इसके बारे में जानकारी प्राप्त हुई।
- खगोल विज्ञान की इतिहास की चौथी संगोष्ठी की कार्यवाही नोजा (NOJA) जापान में 13, 14 जनवरी 2022 के संस्करण में हुई। जिसमें मित्सुरू सोमा और कियोताका तनिकावा का वर्णन किया गया है। इसके अनुसार एक दानव अपने जादू का प्रयोग करके मनुष्यों और देवताओं के लिए विनाशकारी परिणामों के साथ सूर्य को आकाश में गायब कर देता है। उस समय देवता महान ऋषि अत्रि से राक्षस के जादू को देखने की अपील करते हैं। देवताओं की इस अपील पर ऋषि अत्रि बाध्य होकर दानव के जादू को नष्ट करते हैं और सूर्य अपने मूल रूप में वापस आ जाता है।
- 900 और 600 ईसा पूर्व के बीच पुस्तक पंचविम्सा ब्राह्मण (सुब्बारायप्पा 2008) में ग्रहण का वर्णन अधिक विस्तृत रूप में दिया गया है। इसमें कहा गया है कि ग्रहण के समय सूर्य अपने मूल रूप से काला, फिर चांदी के जैसा और अंत में लाल हो जाता है। इसके बाद वह अपनी मूल स्थिति में वापस लौट आता है।
- महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने भी ग्रहण के बारे में समझाया। 499 ईस्वी में ग्रहण के बारे में आर्यभट्ट ने अपना दर्शन सामने रखा और समझाया की ग्रहण क्यों होता है। उन्होंने बताया कि चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है और पृथ्वी चंद्रमा की छाया में चला जाता है। जिस कारण सूर्य ग्रहण होता है। आर्यभट्ट ने ज्यामितीय तर्कों और वस्तु के सापेक्ष आकारों की उपयोग कर ग्रहण के मापदंडों की गणना कर एक उत्कृष्ट सूत्रीकरण किया। उनसे पहले से सूर्य और चंद्रमा की गति रेखा के बारे में पता लगाने वाली विधियां ज्ञात थी। इसलिए इन दोनों को मिलाकर 500 ईस्वी के दौरान ग्रहण की तिथि, समय और प्रकृति को वैज्ञानिक रूप से समझना और आसान हो गया।
- गणितीय खगोल विज्ञान पर भारतीय खगोलीय ग्रंथों में सूर्य और चंद्र ग्रहण पर एक पूरा अध्याय समर्पित है। इसके साथ संयोजन के समय पर यदि वर्टीकल सेपरेशन सूर्य और चंद्रमा के कोणीय त्रिज्या के योग से अधिक है तो इसका अर्थ ये माना जाता था कि सूर्य ग्रहण नहीं है। इस पद्धति के कारण से ग्रहण की सटीक तिथि और समय का पता लगाया और आसान हो गया।
आसमानी घटनाओं से भरा रहेगा अप्रैल 2023
अप्रैल का ये महीना केवल सूर्य ग्रहण के नाम ही नहीं रेहगा। इस महीने और भी आसमानी घटनाएं देखने को मिलेगी। जो अप्रैल के महीने में आसमान को चका-चौंध रखेंगी।
7 अप्रैल - 34P/PANSTARRS धूमकेतु फ्लाईबाई पर सबसे निकटतम रहेगा। बृहस्पति परिवार का ये धूमकेतु अप्रैल की शुरुआत में ही देखने को मिलेगा। ये इस समय पृथ्वी के 11 मिलियन मील के भीतर से गुजरेगा। इसे उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्धों में देखा जाएगा। जिसमें उत्तरी क्षेत्रों में अधिक और बेहतर ढंग से देखने को मिलेगा। धूमकेतु "फॉक्सी" तारामंडल वुलपेकुला में होगा और उम्मीद है कि ये इसकी चमक 12.3 की होगी।
20 अप्रैल - साल का पहला पूर्ण सूर्य ग्रहण देखने को मिलेगा। जिसमें सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी के सीधी रेखा में होंगे। चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह से ढक देगा, जिस कारण दिन में रात का एहसास होगा। ये इसलिए और खास है कि क्योंकि सूर्य ग्रहण अमावस्या के दिन लग रहा है। इस समय चंद्रमा का कक्षा पृथ्वी की कक्षा के सबसे नजदीक होगा। सूर्य ग्रहण पर नए चंद्रमा के चारों ओर बेली के मोतियों की एक लंबा प्रदर्शन दिखेगा और सूर्य ग्रहण के दिन गुलाबी क्रोमोस्फीयर का एक भी देखने को मिलेगा। आपको बता दें कि इस साल आपको न केवल पूर्ण सूर्य ग्रहण देखने को मिलेगा बल्कि कुछ महीने के बाद अक्टूबर में वलयाकार सूर्य ग्रहण भी देखने को मिलेगा। जो 18 महीने में एक बार आता है।
21, 22 और 23 अप्रैल - लिरिड उल्का शावर आसमान की शोभा बढ़ाएंगे। लिरिड्स उल्का शावर 21, 22 और 23 अप्रैल को देखने को मिलेगा। इस दौरान प्रति घंटे 10 से 15 उल्का अंधेरे में देख जाएंगे। ये एक दुर्लभ गतिविधि है। इसमें 10 से 15 उल्काएं 100 तक भी जा सकते हैं। उल्का शावर आपको उत्तरी और दक्षिणी दोनों गोलार्द्धों से दिखाई देगा, लेकिन उत्तरी गोलार्द्ध में इसकी सक्रियता अधिक है।


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