भारत में मातृ मृत्यु अनुपात में हाल के कुछ सालों में कमी देखी जा रही हैं। एक समय था जब मातृ मृत्यु और शिशु मृत्यु अनुपात बहुत अधिक था। भारत के कई राज्य है जहां गांवों से अस्पताल की दूरी इतनी अधिक है कि लेबर की स्थिति में महिला को अस्पताल लेके जाते में ही उनकी मृत्यु हो जाती थी। इतना ही नहीं घरों से अस्पताल की दूरी की वजह से घर पर बच्चे के जन्म के प्रयास की वजह से और उस दौरान सही देखभाल न मिलने के वजह से भी कई महिलाओं की मृत्यु हो जाती थी। इस स्थिति में सुधार लाने के लिए भारत सरकार ने कई योजनाओं की शुरूआत की जिससे मातृ मृत्यु अनुपात में कमी लाई जा सकें। आइए जाने पहले के मुकाबले किस तरह से भारत की मातृ मृत्यु दर में कमी आइए है और उन योजनाओं को समझे जिनकी वजह से यह कार्य संभव हो पाया है।
भारत के महापंजीयक द्वारा जारी एमएमआर पर विशेष बुलेटिन के अनुसार भारत के मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) में 10 अंकों की गिरावट आई है। अनुपात 2016-18 में 113 से गिरकर 2017-19 में 103 (8.8% गिरावट) हो गया है। देश में एमएमआर में 2014-2016 में 130, 2015-17 में 122, 2016-18 में 113 और 2017-18 में 103 तक की कमी देखी गई है। आइए उन योजनाओं के बारे में जाने जिनकी वजह से मातृ मृत्यु में कमी आई है।
भारत के राज्यों में मातृ मृत्यु अनुपात (MMR)
इस लगातार गिरावट के साथ, भारत 2020 तक 100/लाख जीवित जन्मों के राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (NHP) के लक्ष्य को प्राप्त करने और निश्चित रूप से 2030 तक 70/लाख जीवित जन्मों के एसडीजी लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। वह राज्य जिन्होंने सतत विकास लक्ष्य (SDG) में इस लक्ष्य को हासिल कर लिया है। जिन राज्यों ने इस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया है उनके नाम कुछ इस प्रकार है- केरल (30), महाराष्ट्र (38), तेलंगाना (56), तमिलनाडु (58), आंध्र प्रदेश (58), झारखंड (61), गुजरात (70), कर्नाटक (83) और हरियाणा (96)। अब इन राज्यों के लिए इस लक्ष्य को 5 से बढ़कर 7 कर दिया गया है।
भारत के पांच राज्य जहां मातृ मृत्यु 100 से 150 के बीच है उनके नाम कुछ इस प्रकार हैं - उत्तराखंड (101), पश्चिम बंगाल (109), पंजाब (114), बिहार (130), ओडिशा (136) और राजस्थान (141)। इसी के साथ चार ऐसे राज्य हैं जिनमें एमएमआर अभी भी 150 से ऊपर है, उन राज्यों के नाम है - छत्तीसगढ़ (160), मध्य प्रदेश (163), उत्तर प्रदेश (167) और असम (205)।
पहले के समय के मुकाबले उत्तर प्रदेश ने उत्साहजनक उपलब्धि दर्ज की है जहां मातृ मृत्यु में सबसे अधिक 30 अंकों की गिरावट दर्ज की गई वहीं राजस्थान में 23 अंक, बिहार में 19 अंक, पंजाब में 15 अंक और ओडिशा में 14 अंक की गिरावट दर्ज की गई। ये उल्लेखनीय है कि भारत के तीन राज्यों (केरल, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश) ने एमएमआर में 15% से अधिक की गिरावट दर्ज की वहीं 6 राज्य जिसमें झारखंड, राजस्थान, बिहार, पंजाब, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश हैं जिनमें 10-15% के बीच गिरावट देखी गई। इसी के साथ चार राज्य- मध्य प्रदेश, गुजरात, ओडिशा और कर्नाटक में 5-10% के बीच गिरावट को दर्ज किया गया।
पश्चिम बंगाल, हरियाणा, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ ने मातृ मृत्यु अनुपात में वृद्धि होने की वजह से इन राज्यों को एसडीजी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए और एमएमआर में गिरावट को तेज करने के लिए अपनी रणनीति में बदलाव कर उसका पुनर्मूल्यांकन करने और अपने इन प्रयासों को तेज करने की आवश्यकता है।
ये जानना जरूरी है कि किस प्रकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत रणनीतिक निवेश लगातार बढ़ रहा है और लाभांश दे रहा है। भारत सरकार द्वारा चलाए गए प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान, लेबर रूम क्वालिटी इम्प्रूवमेंट इनिशिएटिव, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम और जननी सुरक्षा योजना के संयोजन में गुणवत्ता-की-देखभाल के प्रयासों के तहत एमएमआर में उल्लेखनीय लाभ अर्जित किया गया है। इसके अलावा MoWCD द्वारा प्रमुख योजनाएं भी चलाई गई है जो कि प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) और पोषण अभियान कमजोर आबादी, विशेष रूप से गर्भवती और नर्सिंग महिलाओं और बच्चों के लिए पोषण वितरण को लक्षित करते हैं। यह उपलब्धि महिलाओं के लिए 'सुरक्षित मातृत्व आश्वासन' के भारत सरकार के संकल्प को एक उत्तरदायी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली बनाकर मजबूत करती है जो शून्य रोकथाम योग्य मातृ और नवजात मृत्यु को प्राप्त करने का प्रयास करती है। इसी के साथ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने 2021 में मातृ प्रसवकालीन बाल मृत्यु निगरानी प्रतिक्रिया (एमपीसीडीएसआर) सॉफ्टवेयर लॉन्च किया है ताकि मातृ मृत्यु के लिए कार्रवाई करने योग्य डेटा प्राप्त करने के लिए एक-स्टॉप एकीकृत सूचना मंच को तैयार किया जा सके। इसके साथ ही, भारत सरकार ने मिडवाइफरी पहल के तहत "मिडवाइफरी में नर्स प्रैक्टिशनर" के नए कैडर के निर्माण की शुरुआत की ताकि मिडवाइफरी केयर नेतृत्व वाली इकाइयों में सम्मान के साथ महिलाओं के लिए सकारात्मक रूप से बच्चे के जन्म का अनुभव सुनिश्चित किया जा सके।

मातृ मृत्यु दर में सुधार के लिए योजनाएं
· 2016 में प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (पीएमएसएमए) की शुरूआत की गई जिसके तहत हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं को निश्चित दिन, नि:शुल्क और गुणवत्तापूर्ण प्रसवपूर्व देखभाल प्रदान की जाती है।
· प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना (पीएमएमवीवाई) को 2017 से लागू किया गया था। यह एक प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) योजना है जिसके तहत गर्भवती महिलाओं को सीधे उनके बैंक खाते में नकद लाभ प्रदान किया जाता है ताकि उनकी पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा किया जा सके और मजदूरी के नुकसान की आंशिक भरपाई की जा सके।
· लेबर रूम क्वालिटी इम्प्रूवमेंट इनिशिएटिव की शुरूआत 2017 में की गई थी। जिसका उद्देश्य लेबर रूम और ऑपरेशन थिएटर में देखभाल की गुणवत्ता में सुधार करना है। ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि गर्भवती महिलाओं को लेबर के दौरान और उसके तुरंत बाद की अवधि में सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण देखभाल मिल सके।
· भारत सरकार बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की पोषण स्थिति को सुधारने के लिए 2018 से पोषण अभियान की शुरूआत की।
· एनीमिया मुक्त भारत (AMB): साल 2018 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने जीवन चक्र दृष्टिकोण में पोषण और गैर-पोषक कारणों से एनीमिया के स्थिति को कम करने के लिए 'एनीमिया मुक्त भारत' रणनीति शुरू की। इस रणनीति के 30 मिलियन गर्भवती महिलाओं के साथ करीब 450 मिलियन लाभार्थियों तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।
· सुरक्षित मातृत्व आश्वासन (SUMAN) योजना 2019 से प्रभावी हुई। इसका मुख्य उद्देश्य बिना किसी लागत के यह सुनिश्चित करना है कि महलाओं को सम्मानजनक और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदान की जा सके और महिला और नवजात शिशु मृत्यु दर को रोकने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा का दौरा करने वाली प्रत्येक महिला और नवजात शिशु के लिए सेवाओं से इनकार करने के लिए जीरो टॉलरेंस प्रदान करना है।
· जननी सुरक्षा योजना (JSY) एक मांग प्रोत्साहन और सशर्त नकद हस्तांतरण योजना है जो अप्रैल 2005 में गर्भवती महिलाओं के बीच संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने के उद्देश्य के लिए शुरू की गई थी।
· जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK) का मुख्य उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और बीमार शिशुओं को सिजेरियन सेक्शन, मुफ्त परिवहन, निदान, दवाएं, अन्य उपभोग्य वस्तुएं, आहार और रक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों सहित मुफ्त प्रसव का अधिकार देकर उनके खर्च को खत्म करना है।
· स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं के प्रशिक्षण, दवाओं, उपकरणों की आपूर्ति, सूचना शिक्षा और संचार (आईईसी) आदि के माध्यम से हो रहीं गर्भपात देखभाल की सेवाओं को और मजबूत किया जाता है।
· डिलीवरी पॉइंट- देश भर में 25,000 से अधिक 'डिलीवरी पॉइंट्स' को व्यापक आरएमएनसीएएच+एन सेवाओं के प्रावधान के लिए बुनियादी ढांचे, उपकरण और प्रशिक्षित जनशक्ति के मामले को मजबूत किया गया है।
· जनशक्ति, रक्त भंडारण इकाइयों, रेफरल लिंकेज आदि को सुनिश्चित करके प्रथम रेफरल इकाइयों (एफआरयू) का कार्यकरण का ध्यान रखना है।
· माताओं और बच्चों को प्रदान की जाने वाली देखभाल की गुणवत्ता में सुधार के लिए उच्च केसलोड सुविधाओं पर मातृ एवं बाल स्वास्थ्य (MCH) विंग की स्थापना की गई।
· जटिल गर्भधारण से निपटने के लिए देश भर में उच्च केस लोड तृतीयक देखभाल सुविधाओं पर प्रसूति आईसीयू/एचडीयू का संचालन करना है।
· विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में इन विषयों में विशेषज्ञों की कमी को दूर करने के लिए सी-सेक्शन (EMOC) कौशल सहित एनेस्थीसिया (LSAS) और प्रसूति देखभाल में एमबीबीएस डॉक्टरों के लिए क्षमता निर्माण किया जाता है।
· मातृ मृत्यु निगरानी समीक्षा (MDSR) सुविधाओं और सामुदायिक स्तर दोनों पर लागू की जाती है। इसका उद्देश्य उचित स्तर पर सुधारात्मक कार्रवाई करना और प्रसूति देखभाल की गुणवत्ता में सुधार करना है।
· मासिक ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस (VHSND) पोषण सहित मातृ एवं शिशु देखभाल के प्रावधान के लिए एक आउटरीच गतिविधि है।
· एएनसी के शीघ्र पंजीकरण, नियमित एएनसी, संस्थागत प्रसव, पोषण और गर्भावस्था के दौरान देखभाल आदि के लिए नियमित आईईसी/बीसीसी गतिविधियां संचालित की जाती हैं।
· गर्भवती महिलाओं को आहार, आराम, गर्भावस्था के खतरे के संकेत, लाभ योजनाओं और संस्थागत प्रसव के बारे में शिक्षित करने के लिए एमसीपी कार्ड और सुरक्षित मातृत्व पुस्तिका वितरित की जाती है।
लोकसभा में मातृ मृत्यु को लेकर की गई पेशकश
भारत सरकार ने 2030 तक में एमएमआर को 70 प्रति 100,000 जीवित जन्म से कम करने के एसडीजी लक्ष्य को अपनाया है। भारत के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी नमूना पंजीकरण प्रणाली (एसआरएस) की रिपोर्ट के अनुसार भारत की मातृ मृत्यु अनुपात, एसआरएस 2016-18 में प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 113 से 10 अंक कम होकर एसआरएस में 103 हो गया है। 2017-19. एसडीजी लक्ष्य हासिल करने वाले राज्यों के साथ राज्य/संघ राज्य क्षेत्र-वार एमएमआर अनुलग्नक में दिया गया है।
भारत में आईएमआर और एमएमआर की स्थिति
भारत के महापंजीयक (आरजीआई) के नमूना पंजीकरण प्रणाली बुलेटिन के अनुसार शिशु मृत्यु दर 2015 में 37 प्रति 1000 जीवित जन्मों से घटकर 2019 में राष्ट्रीय स्तर पर 30 प्रति 1,000 जीवित जन्म हो गई है।
2015 से 2019 के दैरान शिशु मृत्यु दर राज्य/केंद्र शासित राज्य
- राष्ट्रीय नमूना पंजीकरण प्रणाली के आंकड़ों की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार 2016 से 18 की अवधि के लिए भारत का मातृ मृत्यु अनुपात 113/100,000 जीवित जन्म था जो 2014 से 16 में 130/100,000 जीवित जन्मों से 17 अंकों की गिरावट पर है।
- 2016 की तुलना में 2018 में सालाना 2,500 अतिरिक्त माताओं को बचाया गया है। कुल अनुमानित वार्षिक मातृ मृत्यु 2016 में 33800 मातृ मृत्यु से घटकर 2018 में 26437 हो गई।
- गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं 15 से 19 वर्ष की आयु की लड़कियों में मृत्यु का पहला कारण हैं। किशोर लड़कियां अभी भी खुद को विकसित कर रही हैं, इसलिए गर्भवती होने पर उन्हें जटिलताओं का अधिक खतरा होता है। इसके अलावा, वयस्क के रूप में विवाहित महिलाओं की तुलना में बाल वधू का गर्भवती होने या स्वास्थ्य सुविधा में प्रसव के दौरान उचित चिकित्सा देखभाल प्राप्त करने की संभावना कम होती है।


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