नौकरी है, लेकिन फिर भी बेरोजगार? ये क्या है? ये कैसे हो सकता है? इस हेडलाइन पर क्लिक करने के बाद आपके मन में ऐसे ही सवाल आये होंगे! फिर आपने सोचा होगा कि ये वो डाटा है, जो बेरोजगारी दर की गणना के दौरान छिपाया गया होगा, इसीलिए रोजगार होते हुए भी बेरोजगार कहला रहे हैं। या फिर आप इसे सरकारी आंकड़ों का खेल समझ रहे होंगे! लेकिन ऐसा कुछ नहीं है, हम आपको जो बताएंगे, वो किसी डाटा का खेल नहीं, बल्कि यथार्थ है। यानि कि सच वो भी कड़वा!

आगे बढ़ने से पहले हम बात करेंगे भारत में बेरोजगारी की दर की। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) द्वारा हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में अप्रैल 2023 में बेरोजगारी की दर 18.11% रही। जोकि मार्च में 7.8 प्रतिशत थी। वहीं शहरों में बेरोजगारी दर देखें तो वो 8.51 प्रतिशत से बढ़ कर 9.81 प्रशित हो गई है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 7.34% दर्ज की गई है।
सीएमआईई के आंकड़े कहते हैं कि अप्रैल माह में देश के शहरों में 54.8 प्रशित लोगों को रोजगार मिला, जबकि गॉंवों में 94.6% लोग रोजगार की बुक में शामिल हुए।
क्या होती है बेरोजगारी दर?
बेरोजगारी वो परिस्थिति होती है जब व्यक्ति नौकरी पाने के लिए भरपूर प्रयास करता है, लेकिन उसे काम नहीं मिलता है। उसकी सारी पढ़ाई-लिखाई, धरी की धरी रह जाती है और वो बेरोजगार की श्रेणी में आ जाता है। दरअसल बेरोजगार एक ऐसा फैक्टर है, जो सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है।
कैसे निकाली जाती बेरोजगारी की दर?
बेरोजगारी की गणना करने के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल बेरोजगारी दर की गणना का इस्तेमाल होता है। बेरोजगारी दर मतलब प्रति 100 लेबर फोर्स यानि श्रमिक शक्ति में से कितने लोगों को रोजगार नहीं मिला। गणित की भाषा में समझे तो
बेरोजगारी दर = (बेरोजगार श्रमिक / कुल श्रमिक) × 100
बेरोजगारी और बेरोजगारी दर को समझने के बाद अब आपको यह समझने में आसानी होगी कि कैसे नौकरी होते हुए भी आप बेरोजगारों की श्रेणी में आ सकते हैं। इसके लिए आपको यह जानना जरूरी है कि भारत में कितने प्रकार के बेरोजगार होते हैं।

बिना सैलरी के बेरोजगार
जाहिर है, सैलरी नहीं मिल रही है, इसका मतलब आप बेरोजगार ही हुए। इस मुख्य श्रेणी में पॉंच प्रकार के बेरोजगार आते हैं जो इस प्रकार हैं-
1. पढ़े-लिखे बेरोजगार (Educated Unemployed)
ऐसे लोग जिन्होंने कम से कम ग्रेजुएशन किया है, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी उन्हें नौकरी या कोई अन्य रोजगार नहीं मिल रहा है, वो इस पढ़े-लिखे बेरोजगार की श्रेणी में आते हैं। भारत में ऐसे बेरोजगार बड़ी संख्या में हैं। ।
2. मौसमी बेरोजगार (Seasonal Unemployment)
ऐसे लोग जिनके पास किसी विशेष मौसम में रोजगार नहीं होता है, वो इस श्रेणी में आते हैं। इस श्रेणी में किसान, लेबर, आदि आते हैं, जिनका काम मौसम के साथ बदलता है और कुछ मौसम में उन्हें खाली बैठना पड़ता है।

3. टेक्नोलॉजिकल बेरोजगार Technological Unemployment
जब टेक्नोलॉजी के अपग्रेड होने पर किसी की नौकरी चली जाती है तब यह स्थिति पैदा होती है। जिस तरह से आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस और मशीनलर्निंग का दायरा बढ़ रहा है, उससे साफ है कि आने वाले समय में इस श्रेणी के बेरोजगारों की संख्या बढ़ेगी।
4. असुरक्षित बेरोजगार (Vulnerable Unemployment)
ऐसे लोग जिन्हें नौकरी मिल जाती है, पैसा भी मिलता है, लेकिन किसी भी प्रकार का कॉन्ट्रैक्ट आदि नहीं होता। मालिक जब चाहें निकाल दें। उनकी सैलरी का हिसाब किताब भी दस्तावेजों में मेनटेन नहीं किया जाता है। अगर आपको कहीं नौकरी मिली है और कंपनी ने कहा कि आपको सैलरी कैश में देंगे और प्रॉविडेंट फंड आदि नहीं देंगे, तो समझ लीजिए कि आप इसी कैटेगरी में हैं। आपकी नौकरी पूरी तरह असुरक्षित है और कभी भी जा सकती है। यूं कहिये कि आपकी नौकरी आपकी मेहनत व काम पर नहीं मालिक या बॉस के मूड पर निर्भर करेगी।
5. चक्रीय बेरोजगार (Cyclical Unemployment)
बेरोजगार की इस श्रेणी में वो लोग आते हैं, जो किसी परिस्थति की वजह से रोजगार खो बैठते हैं। जैसे रिसेशन आने पर जब नौकरी चली जाये, तो उन लोगों को इस श्रेणी में रखा जाता है। अगर किसी कंपनी के शेयर गिर जाते हैं तब वो कर्मचारियों को निकालती है, तो वो बेरोजगार भी इसी श्रेणी में आयेंगे।
6.संरचनात्मक बेरोजगार (Structural Unemployment)
जब बाज़ार में उपलब्ध नौकरियों के लिए जरूरी स्किल सेट कर्मचारियों के स्किल सेट से मैच नहीं करते हैं, तब इस प्रकार की बेरोजगारी की नौबत आती है। भारत में भारी संख्या में ऐसे लोग हैं जो नई तकनीकियों से अंजान होने की वजह से नौकरी से वंचित हैं। इस श्रेणी में आने वाले लोग वो हैं, जिन्की पढ़ाई-लिखाई ठीक ढंग से नहीं हो पाती है और जिन्हें तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने का मौका नहीं मिलता है।
सैलरी मिलती है, लेकिन फिर भी आप बेरोजगार
भारत में जिस तरह से चाटुकारिता के आधार पर आसानी से नौकरी मिल जाती है, उसे देखते हुए साफ अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि बेरोजगारों की इस मुख्य श्रेणी में भारी संख्या में लोग आते हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि इस श्रेणी में जो लोग आते हैं, वो किसी कंपनी में काम कर रहे हैं, सैलरी भी पा रहे हैं और साल के अंत में उनको अच्छा हाइक भी मिलता है, फिर भी वो बेरोजगार हैं।
दरअसल बेरोजगारों की यह सातवीं कैटगरी इन्हीं लोगों की वजह से है। ये लोग छद्म बेरोजगारी (disguised unemployment) के अंतर्गत आते हैं। दरअसल ऐसी परिस्थिति तब बनती है, जब किसी कंपनी में कोई एक काम जो एक या दो लोग कर सकते हैं, लेकिन उसके बावजूद उस काम पर चार से पांच लोग तैनात किए गए हों, तब पहले दो लोगों को छोड़ कर बाकी के तीन लोग छद्म बेरोजगारों की श्रेणी में आते हैं।
अर्थव्यवस्था पर नहीं आउटपुट पर डालता है प्रभाव
भारत की बात करें तो असंगठित क्षेत्र ऐसे बेरोजगारों से भरा पड़ा है। यही नहीं तमाम कंपनियां जहां चाटुकारिता के आधार पर नौकरी मिल जाती है वहां के लीडर अपने सगे संबंधियों को उनकी बिना डिग्री देखे, उनका बिना टेस्ट लिये भर्ती कर लेते हैं, और कंपनी में आने के बाद ऐसे लोग केवल एक बोझ की तरह होते हैं। कुल मिलाकर ऐसी स्थिति गलत नेतृत्व की वजह से ही पैदा होती है।
आपको यह भी जानना चाहिए कि इस श्रेणी की बेरोजगारी की वजह से अर्थव्यवस्था पर तो ज्यादा असर नहीं पड़ता है, लेकिन जब बड़ी संख्या में लोग बहुत कम मात्रा में उत्पादन करते हैं, तो आने वाले समय में उनके स्वयं के सामने नौकरी का संकट खड़ा हो जाता है। क्योंकि कंपनी कोई भी हो प्रोडक्टिविटी कम होगी तो आमदनी भी कम ही होगी।


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