दुनिया को शांति का संदेश देने वाले दलाई लामा के जीवन से जुड़ी रोचक बाते

14 वें परम पावन दलाई लामा, तेनज़िन ग्यात्सो का जन्म 6 जुलाई 1935 में उत्तरपूर्वी तिब्बत के तक्सरे, अमदो के एक छोटे से गांव में एक किसान परीवार में हुआ था। दलाई लामा तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु हैं। दलाई लामा अपने आप को बौद्ध भिक्षु के रूप में मानते है। ये माना जाता है कि दलाई लामा 'अवलोकितेश्वर' या 'चेनरेजिग' के बोधिसत्व और तिब्बत के संरक्षक संत की अभिव्यक्ति हैं। वह मानते है कि बोधिसत्व संवेदनशील प्राणीयों के लिए अपनी इच्छा से बुद्धत्व प्राप्त करना है। जिन्होंने मानवता की मदद के लिए दुनिया में पुनर्जन्म लेने की कसम खाई है।

 
दुनिया को शांति का संदेश देने वाले दलाई लामा के जीवन से जुड़ी रोचक बाते

तिब्बत में दलाई लामा की शिक्षा

परम पावन 14वें दलाई लामा ने 6 वर्ष की उम्र में मोनेस्टिक शिक्षा प्राप्त की। नालंद सांस्कृति के अनुसार इसमें पांच बड़े और पांच छोटे विषय है। प्रमुख विषयों में ललित कला, संस्कृत व्याकरण और चिकित्सा शामिल होती है। लेकिन इसमें बौद्ध धर्म पर ज्यादा जोर दिया जाता है।

बौद्ध धर्म को पांच श्रेणी में बांटा गया था। जो इस प्रकार है। प्रज्ञापरमिता, ज्ञान की पूर्णता; मध्यमिका, मध्य मार्ग का दर्शन; विनय, मठवासी अनुशासन का सिद्धांत; अबिधर्म, तत्वमीमांसा; और प्रमाण, तर्क और ज्ञानमीमांसा। पांच छोटे विषयों में कविता, नाटक, ज्योतिष, रचना और समानार्थक शब्द शामिल थे।

1959 में वार्षिक महान प्रार्थना के दौरान 23 वर्ष के परम पावन दलाई लामा ने ल्हासा के जोखांग मंदिर में अपनी अंतिम परीक्षा दी और पूरे सम्मान के साथ उन्हें बौद्ध फिलॉसफी में डॉक्टरेट उपाधि से सम्मानित किया गया।

 

विश्वव्यापी मान्यता

दलाई लामा एक शांतिप्रिय व्यक्ति हैं। तिब्बत को फ्री करने के लिए उनके अहिंसक संघर्ष के लिए उन्हें 1989 में नोबेल शांति पुरस्करा मिला था। वह लागातार अहिंसा की नीतियों की वकालते करते आए हैं।

पर्यावरण की समस्याओं पर अपनी चिंता दिखाने वाले वह पहले नोबेल पुरस्कार विजेता हैं।

दलाई लामा ने 6 महादिव्पों के 67 से अधिक देशों की यात्रा की है।

शांति, अहिंसा, धार्मिक समझ और विश्वव्यपी जिम्मेदारी और करूणा के संदेश के लिए मानद डॉक्टरेट पुरस्कार जैसे 150 से अधिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

परम पावन दलाई लामा ने लगभग 110 से अधिक पुस्तकों का लेखन और सह-लेखन भी किया है।

तिब्बत का नेतृत्व

वर्ष 1950 में जब चीन ने तिब्बत पर हमला किया था तो उसके बाद दलाई लामा को राजनीतिक सत्ता संभालने के लिए आमंत्रित किया गया था। सत्ता संभालने के दौरान ही वह माओत्से तुंग और अन्य चीनी नेताओं से मिलने बीजिंग गए।

1959 में ल्हास में तिब्बत राष्ट्र को चीनी सैनिकों द्वारा पूरी तरह से दबा दिया गया तो इस स्थिति के चलते परम पावन दलाई लामा को अपने निवास स्थान को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा

तभी से आज तक वह कांगड़ा शहर धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश में रह रहे हैं। दलाई लामा के नेतृत्व वाली तिब्बत प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र में तिब्बत की स्थिति पर सवाल किया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा नें 1959, 1961 और 1965 में 3 प्रस्तावों को अपनाए।

दलाई लामा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया

तिब्बत के लोकतांत्रिक संविधान के लिए दलाई लामा ने एक ड्राफ्ट पेश किया। इस ड्राफ्त की मदद से तिब्बत के प्रशासन को लोकतांत्रिक बनाने के लिए कई छोटे बड़े सुधार किए गए। इसके बाद नए लोकतांत्रिक संविधान का नाम "द चार्टर ऑफ तिब्बतन इन एक्सिल" दिया गया। इसमें पूरें विस्तार के साथ तिब्बत प्रशासन के कामकाजों के बारे में दिशा-निर्देश दिए गए।

साल 1992 में मुक्त तिब्बत सरकार के लिए दिशानिर्देश दिए और कहा कि जब तिब्बत स्वतंत्र हो जाएगा तब एक अंतरिम सरकार की स्थापना की जाएगी। जिसकी सबसे पहली जिम्मेदारी तिब्बत के लिए लोकतांत्रिक सरकार बनाने की होगी।

दलाई लामा ने इस पर अपनी आशाओं को स्पष्ट कर दिया कि भविष्य का तिब्बत, जिसमें यू-त्सांग, अमदो और खाम के तीन पारंपरिक प्रांत शामिल हैं, संघीय और लोकतांत्रिक होगा।

1990 में जब दलाई लामा के सुधारों की वजह से तिब्बत प्रशासन पूरी तरह से लोकतांत्रिक हो गया था। इसी साल भारत में रहने वाले तिब्बतियों और 33 अन्य देशों ने एक व्यक्ति एक वोट के आधार पर ग्यारहवीं तिब्बती विधानसभा के लिए 46 सदस्यों का चुनाव किया। उसके बाद उन चुने गए सदस्यों ने नए मंत्रीमंडल के सदस्यों को चुना। लोकतांत्रिकरण को आगे बढ़ाते हुए तिब्बती मतदाताओं ने कैबिनेट के अध्यक्ष कलोन त्रिपा को चुना। असके बाद कलोन त्रिपा ने अपना मंत्रिमंडल नियुक्त किया जिसे तब तिब्बती सभा द्वारा मंजुर किया जाना था।
लंबे समय के बाद पहली बार तिब्बत में लोगों ने अपने राजनीतिक नेता का चयन किया था। 2011 में चुने गए नेता को अपने राजनीतिक अधिकार सौपने के बाद दलाई लामा ने खुद को रिटायर्ड घोषित किया।

राजनीति से रिटायर्मेंट

2011 में दलाई लामा ने तिब्बती पीपुल्स डेप्युटीज को पत्र लिख कर अनुरोध करते हुए कहा कि वह उन्हें उनके अस्थायी अधिकारों से मुक्त कर दे। क्योंकि वह तिब्बत चार्टर के अनुसार तब भी प्रमुख थे। इसी के साथ उन्होंने ये घोषणा भी कि की वह उस प्रथा को खत्म करते है जिसके माध्यम से दलाई लामाओं ने तिब्बत में आध्यात्मिक और राजनीतिक अधिकार का प्रयोग किया था। उन्होंने इस बात पर पुष्टि की कि लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेतृत्व तिब्बती राजनीतिक मामलों के लिए पूर्ण रूप से जिम्मेदारी ग्रहण करेगा।


पुनर्जन्म को मान्यता

1969 में दलाई लामा ने स्पष्ट किया की दलाई लामा के पुनर्जन्म को मान्यता दी जानी चाहिए या नहीं। यह तिब्बती लोगों, मंगोलियाई लोगों और हिमालयी क्षेत्रों के लोगों के लिए बड़ा निर्णय था। हालांकि ये एक जोखिम था। यदि आगे के समय में जनता दलाई लामा को पहचानने की इच्छा जताती है तो राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस स्थिता का फायदा उठाया जा सकता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए। 24 सितंबर 2011 में अगले दलाई लामा के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किए गए। जिसमें धोखा और संदेह के लिए कोई जगह नहीं है।

दलाई लामा ने एक घोषणा में कहा कि वह जब 90 वर्ष के होंगे तब वह तिब्बत के बौद्ध धर्म की परंपराओं के लामाओं के साथ परामर्थ कर इस बात का मुल्यांकन करेंगे की क्या उनके बाद भी दलाई लामा की संस्था जारी रहनी चाहिए।

उनके इस बयान से उन तरीकों के बारे में पता लगाया गया जिससे 15वें उत्तराधिकारी की पहचान की दे सकें। यदि 15वें दलाई लामा को मान्यता दी जाती है जो इसका फैसला गादेन फोडरंग ट्रस्ट के अधिकारियों द्वारा लिया जाएगा। परम पावन दलाई लामा ने कहा है कि वह इस बारे में स्पष्ट और लिखित तौर पर निर्देश छोड़ेंगे। इसी के साथ उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि वैध तरीकों और मान्यता प्राप्त पुनर्जन्म के अलावा यदि किसी व्यक्ति ने राजनीति उद्देश्यों की पूर्ती के लिए किसी उम्मीदवार को मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। और इसमें पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के एजेंटस को भी शामिल किया गया हैं।

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English summary
Dalai Lama born on 6th july 1935. His Holiness is currently living in Kangra, Dharmashala, Himachal Pradesh. Know his biography here on CareerIndia hindi.
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