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जलियांवाला नरसंहार: मौत के तांडव की कहानी

आज जलियांवाला बाग हत्याकांड की 103वीं बरसी मनाई जा रही है। आइए जानते हैं उस भयानक दिन की दर्द भरी कहानी।
पंजाब के अमृतसर में स्थित जलियांवाला बाग नरसंहार 13 अप्रैल 1919 को वैशाखी के दिन हुआ था।
जलियांवाला नरसंहार
जलियांवाला बाग में रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा आयोजित हो रही थी।
जलियांवाला नरसंहार
ये सभा पंजाब के दो लोकप्रिय नेताओं सैफुद्दीन किचलू और सत्यपाल की गिरफ्तारी और रोलेट एक्ट के विरोध में रखी गई थी।
अंग्रेज ऑफिसर जनरल डायर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियां चलवा दी थीं।
जलियांवाला नरसंहार
जलियांवाला नरसंहार
अंग्रेजी आंकड़े बताते हैं कि जलियांवाला बाग कांड में 379 लोग मारे गए थे।
जलियांवाला नरसंहार
जबकि भारतीय राष्ट्र कांग्रेस के मुताबिक, एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे।
जलियांवाला बाग नरसंहार में दो हजार से अधिक लोग गोलियों से जख्मी हुए थे।
ब्रिटिश सैनिकों ने महज दस मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाईं थी।
जलियांवाला नरसंहार
अफरातफरी ऐसी मची कि जलियांवाला बाग में मौजूद लोग बाहर नहीं निकल सके।
जलियांवाला नरसंहार
बाहर निकलने का एक ही रास्ता था, जिसे बंद कर दिया गया था और लोगों पर गोलियां बरसाई गई।
1951 में जलियांवाला बाग में शहीद आत्माओं की शांति के लिए एक स्मारक बनवाया गया।
लेकिन 10 साल बाद 1961 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने इसका उद्घाटन किया।
वर्ष 2019 से 2021 के बीच जलियांवाला बाग स्मारक का पुनर्निर्मित किया गया।
स्मारक की देखभाल आज भी मुखर्जी परिवार (स्वतंत्रता सेनानी) के सदस्यों द्वारा की जाती है।
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