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IPC Chapter 1: भारतीय दंड संहिता की धारा 1 से 5 तक क्या है

भारतीय दण्ड संहिता को कुल 23 अध्याय में उप-विभाजित किया गया है, जिसमें 511 खंड शामिल हैं। बता दें कि भारतीय दंड संहिता भारत गणराज्य का आधिकारिक आपराधिक कोड है।
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भारतीय दण्ड संहिता भारत के अन्दर भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किये गए कुछ अपराधों की परिभाषा व दण्ड का प्रावधान करती है। किन्तु यह संहिता भारत की सेना पर लागू नहीं होती।
इंडियन पेनल कोड क्या है?
भारतीय दण्ड संहिता ब्रिटिश काल में 6 अक्टूबर 1860 में लागू हुई। इसके बाद इसमे समय-समय पर संशोधन किए जाते रहे (विशेषकर भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद)। भारत समेत पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी भारतीय दण्ड संहिता को ही लागू किया गया।
आईपीसी की शुरुआत कब हुई?
आईपीसी की शुरुआत 1जनवरी 1862 में सभी ब्रिटिश प्रेसीडेंसी में हुई। गौर करने वाली बात ये है कि भारतीय दंड संहिता का पहला मसौदा थॉमस बबिंगटन मैकाले की अध्यक्षता में प्रथम विधि आयोग द्वारा तैयार किया गया था।
धारा 1. संहिता के संचालन का शीर्षक और विस्तार।
इस अधिनियम को भारतीय दंड संहिता कहा जाएगा, और इसका विस्तार पूरे भारत में होगा।
धारा 2. भारत के भीतर किए गए अपराधों की सजा।
प्रत्येक व्यक्ति इस संहिता के तहत दंड के लिए उत्तरदायी होगा, न कि इसके प्रावधानों के विपरीत प्रत्येक कार्य या चूक के लिए, जिसके लिए वह भारत के भीतर दोषी होगा।
धारा 3. भारत के भीतर किए गए अपराधों की सजा, लेकिन कानून द्वारा विचार किया जा सकता है।
भारत से बाहर किए गए अपराध के लिए किसी भी भारतीय कानून द्वारा उत्तरदायी किसी भी व्यक्ति को इस संहिता के प्रावधानों के अनुसार भारत से बाहर किए गए किसी भी कार्य के लिए उसी तरह से निपटाया जाएगा जैसे कि ऐसा कार्य भारत के भीतर किया गया था।
धारा 4. अतिरिक्त-क्षेत्रीय अपराधों के लिए संहिता का विस्तार।
 इस संहिता के प्रावधान निम्नलिखित द्वारा किए गए किसी भी अपराध पर भी लागू होते हैं-
(1) भारत के बाहर और भारत के बाहर किसी भी स्थान पर भारत का कोई भी नागरिक;
(2) भारत में पंजीकृत किसी जहाज या वायुयान पर कोई व्यक्ति, चाहे वह कहीं भी हो।
(3) भारत के बाहर किसी भी स्थान पर कोई भी व्यक्ति जो भारत में स्थित कंप्यूटर संसाधन को निशाना बनाकर अपराध करता है।
धारा 5. कुछ विधियों पर इस अधिनियम द्वारा प्रभाव न डाला जाना
इस अधिनियम में की कोई बात भारत सरकार की सेवा के ऑफिसरों, सैनिकों, नौसैनिकों या वायु सैनिकों द्वारा विद्रोह और अभित्यजन को दण्डित करने वाले किसी अधिनियम के उपबन्धों, या किसी विशेष या स्थानीय विधि के उपबन्धों, पर प्रभाव नहीं डालेगी।