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Maharana Pratap के जीवन से जुड़े ये तथ्य हर कोई नहीं जानता

गूगल के अनुसार, भारत के गौरवशाली योद्वा और महान राजा महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि 19 जनवरी है, जबकि मेवाड़ का इतिहास बताता है कि महाराणा प्रताप का निधन माघ शुक्ल एकादशी को हुआ था।
Narender Sanwariya
अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार, विक्रम संवत् 1653 की माघ शुक्ल एकादशी के दिन तारीख 29 जनवरी 1597 थी। मेवाड़ राजघराने के सदस्य माघ शुक्ल एकादशी तिथि को ही महाराणा प्रताप की पुण्यतिथि मानते हैं।
मेवाड़ के महाराजा महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 कुंभलगढ़ में हुआ था। वह प्रताप उदय सिंह द्वितीय और महारानी जयवंता बाई के सबसे बड़े बेटे थे।
सोलहवीं शताब्दी के राजपूत शासक महाराणा प्रताप ने अपनी मां जयवंता बाई से से युद्ध कौशल सीखा था। प्रताप के भाले का वजन 81 किलो, छाती कवज 72 किलो और कुल सेन्य पोशाक का वजन 208 था।
महाराणा प्रताप मेवाड़ के 13वें राजा थे। महाराणा प्रताप उदय सिंह द्वितीय के पच्चीस पुत्रों में सबसे बड़े थे। वह मेवाड़ के 54वें शासक थे।
अकबर की सेना ने 1567 में चित्तौड़ घेरना शुरू किया। उस वक्त प्रताप सिंह 27 वर्ष के थे। 18 जून 1576 को महाराणा प्रताप सिंह ने हल्दीघाटी की लड़ाई में आमेर के मान सिंह प्रथम के नेतृत्व में अकबर की सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप के महज 20 हजार सैनिकों ने अकबर की 85 हजार सेना से युद्ध किया। अकबर ने समझौते के लिए प्रताप के पास शान्ति दूतों को भेजा, लेकिन प्रताप ने हर बार यही कहा कि राजपूत योद्धा अधीनता कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता।
इस युद्ध में बेशक मुगल विजयी हुए, लेकिन वह महाराणा प्रताप सिंह तक नहीं पहुंच पाए। हल्दीघाटी का युद्ध गोगुन्दा के पास एक संकरे पहाड़ी दर्रे में हुआ, जिसकी भूमि आज भी हल्दी जैसी पीली है। उसे अब राजस्थान में राजसमंद के नाम से जाना जाता है।
प्रताप सिंह के पास लगभग 3000 घुड़सवार और 400 भील धनुर्धर थे। अंबर के मान सिंह, जिन्होंने 5000-10,000 सैनिकों की सेना की कमान संभाली थी, मुगल सेनापति थे। छह घंटे से अधिक समय तक चले भीषण युद्ध के बाद महाराणा घायल हो गए।
महाराणा प्रताप के सत्रह पुत्र, ग्यारह पत्नियां और पांच पुत्रियां थीं। लेकिन वह हमेशा अपनी पहली पत्नी महारानी अजबदे पंवार को चाहते थे। महाराणा प्रताप के पहले पुत्र अमर सिंह उनके उत्तराधिकारी बने।
महाराणा प्रताप सिंह की मृत्यु 19 जनवरी 1597 को 56 वर्ष की आयु में चावंड में एक शिकार दुर्घटना में लगी चोटों से हुई थी। वह राजपूत वीरता और परिश्रम के प्रतीक थे। उनके साहस और बलिदान के लिए उन्हें राजस्थान में एक नायक के रूप में भी सम्मानित किया गया था।
महाराणा प्रताप सिंह की वीरता के साथ उनके प्रिय घोड़े चेतक को भी याद रखा जाता है। जब युद्ध में मुगल सेना महाराणा का पीछा कर रही थी तो चेतक ने प्रताप को अपनी पीठ पर बैठाकर कई फीट लंबे नाले को पार कर दिया था। आज भी हल्दी घाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है।
कई इतिहासकारों ने अपनी पुस्तकों में लिखा है कि महाराणा प्रताप के निधन का समाचार सुनकर अकबर भी रो पड़ा था। मुगल दरबार के कवि अब्दुल रहमान ने लिखा कि दुनिया में सभी चीज खत्म हो सकती है, लेकिन महान इंसान के गुण हमेशा जिंदा रहेंगे।
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