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Kargil Vijay Diwas 2022: कारगिल युद्ध नायक मनोज कुमार पांडेय की जीवनी

24 साल की उम्र में उन्होंने अपने देश की सेवा करते हुए अपनी जान देश के नाम न्योछावर की। उनके इस अभूतपूर्व योगदान को भारत कभी नहीं भुला पाएगा।
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कारगिल युद्ध के नायक मनोज कुमार पांडेय या यू कहें की हीरो ऑफ बटालिक का जन्म 25 जुन 1975 में हुआ था। इनका जन्म रुधा गांव सीतापूर जिले, उत्तर प्रदेश में हुआ था।
मनोज कुमार पांडेय की प्रारंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल लखनऊ में हुई थी। कैप्टन मनोज पांडेय पढ़ाई के साथ-साथ स्पोर्ट्स में भी अच्छे थे। मुख्य रूप से उनकी बॉक्सिंग और बॉडी बिल्डिंग में रूचि थी। सैनिक स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही मनोज कुमार पांडेय ने तय कर लिया था कि वह सेना में जाएंगे और अपने देश की सेवा करेंगे।
1990 में उन्हें जूनियर एनसीसी (NCC)उत्तर प्रदेश डायरेक्टरेट के बेस्ट कैडेट घोषित किया गया था।
आर्मी में उनके सिलेक्शन के समय सर्विस सिल्क्शन बोर्ड के इंटरव्यू के दौरान जब उनसे पुछा गया की 'वह आर्मी क्यों ज्वाइन करना चाहते हैं?" तो मनोज कुमार पांडेय ने इस सवाल के जवाब में कहा कि "मैं परम वीर चक्र जीतना चाहता हूं।" मरणोपरांत उन्हें सर्वोच्च वीरता सम्मान परम वीर चक्र से 2004 में सम्मानित किया गया।
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नेशनल डिफेंस एकेडमी से ग्रेजुएट होने के बाद मनोज कुमार को लेफ्टिनेंट के पद 7 जून 1997 में 1/11 गोरख राइफल्स में कमीशन किया गया। कारगिल युद्ध से पहले 1/11 गोरख राइफल्स में मनोज कुमार पांडेय की पोस्टिंग सियाजिन ग्लेशियर में थी।
गोरख युनिट को कमांड कर्नल ललीत राय कर रहे थे। जिन पर जुबार, कुकरथाम और खालूंबरे हिस्से को वापस कब्जे में लाने का जिम्मा था। कर्नल ललीत राय द्वारा कमांड वाली इसी यूनिट का हिस्सा मनोज कुमार पांडेय भी थे।
2-3 जुलाई 1999 में मनोज कुमार पांडेय नेतृत्व वाली टीम को खालूंबरे हिस्से पर वापस भारत का कब्जा हासिल करने के अभियान का जिम्मा दिया गया। अपने उद्देश्य के करीब आते- आते पाकिस्तानी सेना की ओर से भारी गोली बारी शुरू होने पर वह और उनकी टीम उस गोली बारी की चपेट में आई।
दिन के उजाले की वजह से उनकी टीम कमजोर स्थिति में थी लेकिन उनकी बहादुरी और तेज निर्णय लेने की क्षमता के कारण उन्होंने पलटन को जल्द लाभकारी स्थिति में पहुंचा दिया। फिर उन्होंने अपनी पलटन के एक हिस्से को दाईं ओर से हमले के लिए भेजा और बाईं ओर से वह खुद हमले के लिए गए।
अपने लक्ष्य पर आगे बढ़ते हुए मनोज कुमार पांडेय ने दो दुश्मनों को मार गिराया और आगे दूसरे बंकर की ओर बढ़ते हुए दो और दुश्मनों को मार गिराया।
तीसरे स्थान पर दुश्मनों के खात्मे के दौरान वह गंभीर रूप से घायल हुए। लेकिन मनोज ने चौथे स्थान पर हमला जारी रखा और ग्रेनेड से बंकर नष्ट कर दिया। इस विस्फोट में उनके माथे पर चोट आई लेकिन उनके दृढ़ निश्चय ने खालूंबरे पर भारत का कब्जा हासिल किया। 3 जुलाई 1999 में इस अभियान में वह वीरगति को प्राप्त हो गए।
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