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स्वतंत्रता दिवस 2022: असम की इन महिलाओं ने आज़ादी में दिया योगदान

जानिए असम की उन महिलाओं के बारे में जिन्होंने दिया आज़ादी में योगदान
chailsy raghuvanshi
स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश काल के अंतिम चरण में तेजपुर, सूतिया, गोहपुर, ढेकियाजुली और जमुगुरी जैसे स्थानों में "करो या मरो" के नारे के साथ भारत छोड़ो आंदोलन को गति मिली। जिसमें की असमिया महिलाओं ने बढ़-चढ़कर कर भाग लिया।
मुंगरी उर्फ मालती मेम
मालती मेम चाय बागानों में अफीम विरोधी अभियान की प्रमुख सदस्यों में से एक थी। 1921 में, शराबबंदी अभियान में कांग्रेस के स्वयंसेवकों का समर्थन करने के लिए दारांग जिले के लालमती में सरकारी समर्थकों द्वारा उनकी हत्या कर दी गई थी।
दारिकी दासी बरुआ
दारिकी सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल थी और अफीम विरोधी अभियान के प्रमुख सदस्यों में से एक थी।
1 फरवरी, 1932 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और अफीम विरोधी पिकेटिंग के लिए उन्हें छह महीने की जेल हुई।
कारावास के समय दारिकी दासी बरुआ गर्भवती थी और फिर बीमार होने के कारण 26 अप्रैल, 1932 को जेल में उनकी मृत्यु हो गई।
भोगेश्वरी फुकानानी
भोगेश्वरी नगांव में स्वतंत्रता आंदोलन की एक सक्रिय आयोजक थी। 18 सितंबर, 1942 को बरहामपुर उन्हें उस अंग्रेज ने गोली मारी जिसे उन्होंने ध्वज के अपमान करने पर ध्वज पोल से पीटा था। मार खाने के बाद अंग्रेज से अपना अपमान सहन नहीं हुआ और उसने उन्हें गोली मार दी जिसके तीन दिन बाद उनकी मौत हो गई।
तिलेश्वरी बरुआ
तिलेश्वरी बरुआ ढेकियाजुली से भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदार थीं। 20 सितंबर, 1942 को ढेकियाजुली में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश के दौरान पुलिस फायरिंग में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
रेबती लाहोन
रेबती भारत छोड़ो आंदोलन की एक सक्रिय भागीदार और आयोजक थी। 1942 में उन्हें जेल में डाल दिया गया था। कारावास के दौरान, जेल में रहने की खराब स्थिति के कारण उन्हें निमोनिया हो गया था। और कैद से बाहर आने के तुरंत बाद उसकी मृत्यु हो गई।
राम प्रसाद बिस्मिल